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राम

7

उत्तरकाण्ड

Uttara Kanda

Ram's coronation, the nature of bhakti, and Shiva-Parvati's dialogue on devotion.

270 verses

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Passage 13 of 14 · Verses 241–260 of 270

दोहा 116

-पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर।। न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर।।115(क)।। सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि। बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट।।115(ख)।।

चौपाई 111

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ। बेद पुरान संत मत भाषउँ।। मोह न नारि नारि कें रूपा। पन्नगारि यह रीति अनूपा।। माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ। नारि बर्ग जानइ सब कोऊ।। पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी। माया खलु नर्तकी बिचारी।। भगतिहि सानुकूल रघुराया। ताते तेहि डरपति अति माया।। राम भगति निरुपम निरुपाधी। बसइ जासु उर सदा अबाधी।। तेहि बिलोकि माया सकुचाई। करि न सकइ कछु निज प्रभुताई।। अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी। जाचहीं भगति सकल सुख खानी।।

दोहा 117

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ। जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ।।116(क)।। औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन। जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन।।116(ख)।।

चौपाई 112

सुनहु तात यह अकथ कहानी। समुझत बनइ न जाइ बखानी।। ईस्वर अंस जीव अबिनासी। चेतन अमल सहज सुख रासी।। सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।। जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।। तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।। श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।। जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी। ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी।। अस संजोग ईस जब करई। तबहुँ कदाचित सो निरुअरई।। सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई। जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई।। जप तप ब्रत जम नियम अपारा। जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा।। तेइ तृन हरित चरै जब गाई। भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई।। नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा। निर्मल मन अहीर निज दासा।। परम धर्ममय पय दुहि भाई। अवटै अनल अकाम बनाई।। तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै। धृति सम जावनु देइ जमावै।। मुदिताँ मथैं बिचार मथानी। दम अधार रजु सत्य सुबानी।। तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता। बिमल बिराग सुभग सुपुनीता।।

दोहा 118

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ। बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ।।117(क)।। तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ। चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ।।117(ख)।। तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि। तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि।।117(ग)।। एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय।। जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब।।117(घ)।।

चौपाई 113

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा। दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा।। आतम अनुभव सुख सुप्रकासा। तब भव मूल भेद भ्रम नासा।। प्रबल अबिद्या कर परिवारा। मोह आदि तम मिटइ अपारा।। तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा। उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा।। छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई। तब यह जीव कृतारथ होई।। छोरत ग्रंथि जानि खगराया। बिघ्न अनेक करइ तब माया।। रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई। बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई।। कल बल छल करि जाहिं समीपा। अंचल बात बुझावहिं दीपा।। होइ बुद्धि जौं परम सयानी। तिन्ह तन चितव न अनहित जानी।। जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी। तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी।। इंद्रीं द्वार झरोखा नाना। तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना।। आवत देखहिं बिषय बयारी। ते हठि देही कपाट उघारी।। जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई। तबहिं दीप बिग्यान बुझाई।। ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा। बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा।। इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई। बिषय भोग पर प्रीति सदाई।। बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी। तेहि बिधि दीप को बार बहोरी।।

दोहा 119

तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस। हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस।।118(क)।। कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक। होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक।।118(ख)।।

चौपाई 114

ग्यान पंथ कृपान कै धारा। परत खगेस होइ नहिं बारा।। जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई। सो कैवल्य परम पद लहई।। अति दुर्लभ कैवल्य परम पद। संत पुरान निगम आगम बद।। राम भजत सोइ मुकुति गोसाई। अनइच्छित आवइ बरिआई।। जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई। कोटि भाँति कोउ करै उपाई।। तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई। रहि न सकइ हरि भगति बिहाई।। अस बिचारि हरि भगत सयाने। मुक्ति निरादर भगति लुभाने।। भगति करत बिनु जतन प्रयासा। संसृति मूल अबिद्या नासा।। भोजन करिअ तृपिति हित लागी। जिमि सो असन पचवै जठरागी।। असि हरिभगति सुगम सुखदाई। को अस मूढ़ न जाहि सोहाई।।

दोहा 120

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि।। भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि।।119(क)।। जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य। अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य।।119(ख)।।

चौपाई 115

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई। सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई।। राम भगति चिंतामनि सुंदर। बसइ गरुड़ जाके उर अंतर।। परम प्रकास रूप दिन राती। नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती।। मोह दरिद्र निकट नहिं आवा। लोभ बात नहिं ताहि बुझावा।। प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई। हारहिं सकल सलभ समुदाई।। खल कामादि निकट नहिं जाहीं। बसइ भगति जाके उर माहीं।। गरल सुधासम अरि हित होई। तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई।। ब्यापहिं मानस रोग न भारी। जिन्ह के बस सब जीव दुखारी।। राम भगति मनि उर बस जाकें। दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें।। चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं। जे मनि लागि सुजतन कराहीं।। सो मनि जदपि प्रगट जग अहई। राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई।। सुगम उपाय पाइबे केरे। नर हतभाग्य देहिं भटमेरे।। पावन पर्बत बेद पुराना। राम कथा रुचिराकर नाना।। मर्मी सज्जन सुमति कुदारी। ग्यान बिराग नयन उरगारी।। भाव सहित खोजइ जो प्रानी। पाव भगति मनि सब सुख खानी।। मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा। राम ते अधिक राम कर दासा।। राम सिंधु घन सज्जन धीरा। चंदन तरु हरि संत समीरा।। सब कर फल हरि भगति सुहाई। सो बिनु संत न काहूँ पाई।। अस बिचारि जोइ कर सतसंगा। राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा।।

दोहा 121

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं। कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं।।120(क)।। बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि। जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि।।120(ख)।।

चौपाई 116

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ। जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ।। नाथ मोहि निज सेवक जानी। सप्त प्रस्न कहहु बखानी।। प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा। सब ते दुर्लभ कवन सरीरा।। बड़ दुख कवन कवन सुख भारी। सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी।। संत असंत मरम तुम्ह जानहु। तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु।। कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला। कहहु कवन अघ परम कराला।। मानस रोग कहहु समुझाई। तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई।। तात सुनहु सादर अति प्रीती। मैं संछेप कहउँ यह नीती।। नर तन सम नहिं कवनिउ देही। जीव चराचर जाचत तेही।। नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी। ग्यान बिराग भगति सुभ देनी।। सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर। होहिं बिषय रत मंद मंद तर।। काँच किरिच बदलें ते लेही। कर ते डारि परस मनि देहीं।। नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं। संत मिलन सम सुख जग नाहीं।। पर उपकार बचन मन काया। संत सहज सुभाउ खगराया।। संत सहहिं दुख परहित लागी। परदुख हेतु असंत अभागी।। भूर्ज तरू सम संत कृपाला। परहित निति सह बिपति बिसाला।। सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई।। खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी।। पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं।। दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू।। संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी।। परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा।। हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई।। द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमइ बायस सरीर धरि।। सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।। होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।। सब के निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं।। सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा।। मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला। तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला।। काम बात कफ लोभ अपारा। क्रोध पित्त नित छाती जारा।। प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई। उपजइ सन्यपात दुखदाई।। बिषय मनोरथ दुर्गम नाना। ते सब सूल नाम को जाना।। ममता दादु कंडु इरषाई। हरष बिषाद गरह बहुताई।। पर सुख देखि जरनि सोइ छई। कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई।। अहंकार अति दुखद डमरुआ। दंभ कपट मद मान नेहरुआ।। तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी। त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी।। जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका। कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका।।

दोहा 122

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि। पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि।।121(क)।। नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान। भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान।।121(ख)।।

चौपाई 117

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी। सोक हरष भय प्रीति बियोगी।। मानक रोग कछुक मैं गाए। हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए।। जाने ते छीजहिं कछु पापी। नास न पावहिं जन परितापी।। बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे। मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे।। राम कृपाँ नासहि सब रोगा। जौं एहि भाँति बनै संयोगा।। सदगुर बैद बचन बिस्वासा। संजम यह न बिषय कै आसा।। रघुपति भगति सजीवन मूरी। अनूपान श्रद्धा मति पूरी।। एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं। नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं।। जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई। जब उर बल बिराग अधिकाई।। सुमति छुधा बाढ़इ नित नई। बिषय आस दुर्बलता गई।। बिमल ग्यान जल जब सो नहाई। तब रह राम भगति उर छाई।। सिव अज सुक सनकादिक नारद। जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद।। सब कर मत खगनायक एहा। करिअ राम पद पंकज नेहा।। श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं। रघुपति भगति बिना सुख नाहीं।। कमठ पीठ जामहिं बरु बारा। बंध्या सुत बरु काहुहि मारा।। फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला। जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला।। तृषा जाइ बरु मृगजल पाना। बरु जामहिं सस सीस बिषाना।। अंधकारु बरु रबिहि नसावै। राम बिमुख न जीव सुख पावै।। हिम ते अनल प्रगट बरु होई। बिमुख राम सुख पाव न कोई।।

दोहा 123क

उबारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल। बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल।।122(क)।। मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन। अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन।।122(ख)।।

श्लोक 3

विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे। हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते।।122(ग)।।

चौपाई 118

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा। ब्यास समास स्वमति अनुरुपा।। श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी। राम भजिअ सब काज बिसारी।। प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही। मोहि से सठ पर ममता जाही।। तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा। नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा।। पूछिहुँ राम कथा अति पावनि। सुक सनकादि संभु मन भावनि।। सत संगति दुर्लभ संसारा। निमिष दंड भरि एकउ बारा।। देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी। मैं रघुबीर भजन अधिकारी।। सकुनाधम सब भाँति अपावन। प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन।।

दोहा 123ख

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन। निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन।।123(क)।। नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ। चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ।।123।।

चौपाई 119

सुमिरि राम के गुन गन नाना। पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना।। महिमा निगम नेति करि गाई। अतुलित बल प्रताप प्रभुताई।। सिव अज पूज्य चरन रघुराई। मो पर कृपा परम मृदुलाई।। अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ। केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ।। साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी। कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी।। जोगी सूर सुतापस ग्यानी। धर्म निरत पंडित बिग्यानी।। तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी। राम नमामि नमामि नमामी।। सरन गएँ मो से अघ रासी। होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी।।

दोहा 125

जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल। सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल।।124(क)।। सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह। बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह।।124(ख)।।
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