Skip to main content
राम

4

किष्किन्धाकाण्ड

Kishkindha Kanda

The alliance with Sugriva, Hanuman's devotion, Bali's defeat, the search for Sita.

61 verses

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 1 of 4 · Verses 1–20 of 61

श्लोक 2

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौं हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः।।1।। ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा। संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्।।2।।

दोहा 1क

मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न।। जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस।।

चौपाई 1

आगें चले बहुरि रघुराया। रिष्यमूक परवत निअराया।। तहँ रह सचिव सहित सुग्रीवा। आवत देखि अतुल बल सींवा।। अति सभीत कह सुनु हनुमाना। पुरुष जुगल बल रूप निधाना।। धरि बटु रूप देखु तैं जाई। कहेसु जानि जियँ सयन बुझाई।। पठए बालि होहिं मन मैला। भागौं तुरत तजौं यह सैला।। बिप्र रूप धरि कपि तहँ गयऊ। माथ नाइ पूछत अस भयऊ।। को तुम्ह स्यामल गौर सरीरा। छत्री रूप फिरहु बन बीरा।। कठिन भूमि कोमल पद गामी। कवन हेतु बिचरहु बन स्वामी।। मृदुल मनोहर सुंदर गाता। सहत दुसह बन आतप बाता।। की तुम्ह तीनि देव महँ कोऊ। नर नारायन की तुम्ह दोऊ।।

दोहा 1ख

जग कारन तारन भव भंजन धरनी भार। की तुम्ह अकिल भुवन पति लीन्ह मनुज अवतार।।1।।

चौपाई 2

कोसलेस दसरथ के जाए । हम पितु बचन मानि बन आए।। नाम राम लछिमन दौउ भाई। संग नारि सुकुमारि सुहाई।। इहाँ हरि निसिचर बैदेही। बिप्र फिरहिं हम खोजत तेही।। आपन चरित कहा हम गाई। कहहु बिप्र निज कथा बुझाई।। प्रभु पहिचानि परेउ गहि चरना। सो सुख उमा नहिं बरना।। पुलकित तन मुख आव न बचना। देखत रुचिर बेष कै रचना।। पुनि धीरजु धरि अस्तुति कीन्ही। हरष हृदयँ निज नाथहि चीन्ही।। मोर न्याउ मैं पूछा साईं। तुम्ह पूछहु कस नर की नाईं।। तव माया बस फिरउँ भुलाना। ता ते मैं नहिं प्रभु पहिचाना।।

दोहा 2

एकु मैं मंद मोहबस कुटिल हृदय अग्यान। पुनि प्रभु मोहि बिसारेउ दीनबंधु भगवान।।2।।

चौपाई 3

जदपि नाथ बहु अवगुन मोरें। सेवक प्रभुहि परै जनि भोरें।। नाथ जीव तव मायाँ मोहा। सो निस्तरइ तुम्हारेहिं छोहा।। ता पर मैं रघुबीर दोहाई। जानउँ नहिं कछु भजन उपाई।। सेवक सुत पति मातु भरोसें। रहइ असोच बनइ प्रभु पोसें।। अस कहि परेउ चरन अकुलाई। निज तनु प्रगटि प्रीति उर छाई।। तब रघुपति उठाइ उर लावा। निज लोचन जल सींचि जुड़ावा।। सुनु कपि जियँ मानसि जनि ऊना। तैं मम प्रिय लछिमन ते दूना।। समदरसी मोहि कह सब कोऊ। सेवक प्रिय अनन्यगति सोऊ।।

दोहा 3

सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत। मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत।।3।।

चौपाई 4

देखि पवन सुत पति अनुकूला। हृदयँ हरष बीती सब सूला।। नाथ सैल पर कपिपति रहई। सो सुग्रीव दास तव अहई।। तेहि सन नाथ मयत्री कीजे। दीन जानि तेहि अभय करीजे।। सो सीता कर खोज कराइहि। जहँ तहँ मरकट कोटि पठाइहि।। एहि बिधि सकल कथा समुझाई। लिए दुऔ जन पीठि चढ़ाई।। जब सुग्रीवँ राम कहुँ देखा। अतिसय जन्म धन्य करि लेखा।। सादर मिलेउ नाइ पद माथा। भैंटेउ अनुज सहित रघुनाथा।। कपि कर मन बिचार एहि रीती। करिहहिं बिधि मो सन ए प्रीती।।

दोहा 4

तब हनुमंत उभय दिसि की सब कथा सुनाइ।। पावक साखी देइ करि जोरी प्रीती दृढ़ाइ।।4।।

चौपाई 5

कीन्ही प्रीति कछु बीच न राखा। लछमिन राम चरित सब भाषा।। कह सुग्रीव नयन भरि बारी। मिलिहि नाथ मिथिलेसकुमारी।। मंत्रिन्ह सहित इहाँ एक बारा। बैठ रहेउँ मैं करत बिचारा।। गगन पंथ देखी मैं जाता। परबस परी बहुत बिलपाता।। राम राम हा राम पुकारी। हमहि देखि दीन्हेउ पट डारी।। मागा राम तुरत तेहिं दीन्हा। पट उर लाइ सोच अति कीन्हा।। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। तजहु सोच मन आनहु धीरा।। सब प्रकार करिहउँ सेवकाई। जेहि बिधि मिलिहि जानकी आई।।

दोहा 5

सखा बचन सुनि हरषे कृपासिधु बलसींव। कारन कवन बसहु बन मोहि कहहु सुग्रीव ।।5।।

चौपाई 6

नात बालि अरु मैं द्वौ भाई। प्रीति रही कछु बरनि न जाई।। मय सुत मायावी तेहि नाऊँ। आवा सो प्रभु हमरें गाऊँ।। अर्ध राति पुर द्वार पुकारा। बाली रिपु बल सहै न पारा।। धावा बालि देखि सो भागा। मैं पुनि गयउँ बंधु सँग लागा।। गिरिबर गुहाँ पैठ सो जाई। तब बालीं मोहि कहा बुझाई।। परिखेसु मोहि एक पखवारा। नहिं आवौं तब जानेसु मारा।। मास दिवस तहँ रहेउँ खरारी। निसरी रुधिर धार तहँ भारी।। बालि हतेसि मोहि मारिहि आई। सिला देइ तहँ चलेउँ पराई।। मंत्रिन्ह पुर देखा बिनु साईं। दीन्हेउ मोहि राज बरिआई।। बालि ताहि मारि गृह आवा। देखि मोहि जियँ भेद बढ़ावा।। रिपु सम मोहि मारेसि अति भारी। हरि लीन्हेसि सर्बसु अरु नारी।। ताकें भय रघुबीर कृपाला। सकल भुवन मैं फिरेउँ बिहाला।। इहाँ साप बस आवत नाहीं। तदपि सभीत रहउँ मन माहीं।। सुनि सेवक दुख दीनदयाला। फरकि उठीं द्वै भुजा बिसाला।।

दोहा 6

सुनु सुग्रीव मारिहउँ बालिहि एकहिं बान। ब्रम्ह रुद्र सरनागत गएँ न उबरिहिं प्रान।।6।।

चौपाई 7

जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी।। निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख रज मेरु समाना।। जिन्ह कें असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई।। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रगटे अवगुनन्हि दुरावा।। देत लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई।। बिपति काल कर सतगुन नेहा। श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।। आगें कह मृदु बचन बनाई। पाछें अनहित मन कुटिलाई।। जा कर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परिहरेहि भलाई।। सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी।। सखा सोच त्यागहु बल मोरें। सब बिधि घटब काज मैं तोरें।। कह सुग्रीव सुनहु रघुबीरा। बालि महाबल अति रनधीरा।। दुंदुभी अस्थि ताल देखराए। बिनु प्रयास रघुनाथ ढहाए।। देखि अमित बल बाढ़ी प्रीती। बालि बधब इन्ह भइ परतीती।। बार बार नावइ पद सीसा। प्रभुहि जानि मन हरष कपीसा।। उपजा ग्यान बचन तब बोला। नाथ कृपाँ मन भयउ अलोला।। सुख संपति परिवार बड़ाई। सब परिहरि करिहउँ सेवकाई।। ए सब रामभगति के बाधक। कहहिं संत तब पद अवराधक।। सत्रु मित्र सुख दुख जग माहीं। माया कृत परमारथ नाहीं।। बालि परम हित जासु प्रसादा। मिलेहु राम तुम्ह समन बिषादा।। सपनें जेहि सन होइ लराई। जागें समुझत मन सकुचाई।। अब प्रभु कृपा करहु एहि भाँती। सब तजि भजनु करौं दिन राती।। सुनि बिराग संजुत कपि बानी। बोले बिहँसि रामु धनुपानी।। जो कछु कहेहु सत्य सब सोई। सखा बचन मम मृषा न होई।। नट मरकट इव सबहि नचावत। रामु खगेस बेद अस गावत।। लै सुग्रीव संग रघुनाथा। चले चाप सायक गहि हाथा।। तब रघुपति सुग्रीव पठावा। गर्जेसि जाइ निकट बल पावा।। सुनत बालि क्रोधातुर धावा। गहि कर चरन नारि समुझावा।। सुनु पति जिन्हहि मिलेउ सुग्रीवा। ते द्वौ बंधु तेज बल सींवा।। कोसलेस सुत लछिमन रामा। कालहु जीति सकहिं संग्रामा।।

दोहा 7

कह बालि सुनु भीरु प्रिय समदरसी रघुनाथ। जौं कदाचि मोहि मारहिं तौ पुनि होउँ सनाथ।।7।।

चौपाई 8

अस कहि चला महा अभिमानी। तृन समान सुग्रीवहि जानी।। भिरे उभौ बाली अति तर्जा । मुठिका मारि महाधुनि गर्जा।। तब सुग्रीव बिकल होइ भागा। मुष्टि प्रहार बज्र सम लागा।। मैं जो कहा रघुबीर कृपाला। बंधु न होइ मोर यह काला।। एकरूप तुम्ह भ्राता दोऊ। तेहि भ्रम तें नहिं मारेउँ सोऊ।। कर परसा सुग्रीव सरीरा। तनु भा कुलिस गई सब पीरा।। मेली कंठ सुमन कै माला। पठवा पुनि बल देइ बिसाला।। पुनि नाना बिधि भई लराई। बिटप ओट देखहिं रघुराई।।

दोहा 8

बहु छल बल सुग्रीव कर हियँ हारा भय मानि। मारा बालि राम तब हृदय माझ सर तानि।।8।।

चौपाई 9

परा बिकल महि सर के लागें। पुनि उठि बैठ देखि प्रभु आगें।। स्याम गात सिर जटा बनाएँ। अरुन नयन सर चाप चढ़ाएँ।। पुनि पुनि चितइ चरन चित दीन्हा। सुफल जन्म माना प्रभु चीन्हा।। हृदयँ प्रीति मुख बचन कठोरा। बोला चितइ राम की ओरा।। धर्म हेतु अवतरेहु गोसाई। मारेहु मोहि ब्याध की नाई।। मैं बैरी सुग्रीव पिआरा। अवगुन कबन नाथ मोहि मारा।। अनुज बधू भगिनी सुत नारी। सुनु सठ कन्या सम ए चारी।। इन्हहि कुद्दष्टि बिलोकइ जोई। ताहि बधें कछु पाप न होई।। मुढ़ तोहि अतिसय अभिमाना। नारि सिखावन करसि न काना।। मम भुज बल आश्रित तेहि जानी। मारा चहसि अधम अभिमानी।।

दोहा 9

सुनहु राम स्वामी सन चल न चातुरी मोरि। प्रभु अजहूँ मैं पापी अंतकाल गति तोरि।।9।।
Continue reading →