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राम

7

उत्तरकाण्ड

Uttara Kanda

Ram's coronation, the nature of bhakti, and Shiva-Parvati's dialogue on devotion.

270 verses

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Passage 14 of 14 · Verses 261–270 of 270

चौपाई 120

मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी। सुनि रघुबीर भगति रस सानी।। राम चरन नूतन रति भई। माया जनित बिपति सब गई।। मोह जलधि बोहित तुम्ह भए। मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए।। मो पहिं होइ न प्रति उपकारा। बंदउँ तव पद बारहिं बारा।। पूरन काम राम अनुरागी। तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी।। संत बिटप सरिता गिरि धरनी। पर हित हेतु सबन्ह कै करनी।। संत हृदय नवनीत समाना। कहा कबिन्ह परि कहै न जाना।। निज परिताप द्रवइ नवनीता। पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता।। जीवन जन्म सुफल मम भयऊ। तव प्रसाद संसय सब गयऊ।। जानेहु सदा मोहि निज किंकर। पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर।।

दोहा 126क

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर। गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर।।125(क)।। गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन। बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान।।125(ख)।।

चौपाई 121

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा। सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा।। प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा। उपजइ प्रीति राम पद कंजा।। मन क्रम बचन जनित अघ जाई। सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई।। तीर्थाटन साधन समुदाई। जोग बिराग ग्यान निपुनाई।। नाना कर्म धर्म ब्रत दाना। संजम दम जप तप मख नाना।। भूत दया द्विज गुर सेवकाई। बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई।। जहँ लगि साधन बेद बखानी। सब कर फल हरि भगति भवानी।। सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई। राम कृपाँ काहूँ एक पाई।।

दोहा 126ख

मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास।।126।।

चौपाई 122

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता। सोइ महि मंडित पंडित दाता।। धर्म परायन सोइ कुल त्राता। राम चरन जा कर मन राता।। नीति निपुन सोइ परम सयाना। श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना।। सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा। जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा।। धन्य देस सो जहँ सुरसरी। धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी।। धन्य सो भूपु नीति जो करई। धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई।। सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।। धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।

दोहा 127

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत।।127।।

चौपाई 123

मति अनुरूप कथा मैं भाषी। जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी।। तव मन प्रीति देखि अधिकाई। तब मैं रघुपति कथा सुनाई।। यह न कहिअ सठही हठसीलहि। जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि।। कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि। जो न भजइ सचराचर स्वामिहि।। द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ। सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ।। राम कथा के तेइ अधिकारी। जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी।। गुर पद प्रीति नीति रत जेई। द्विज सेवक अधिकारी तेई।। ता कहँ यह बिसेष सुखदाई। जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई।।

दोहा 128

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान। भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान।।128।।

चौपाई 124

राम कथा गिरिजा मैं बरनी। कलि मल समनि मनोमल हरनी।। संसृति रोग सजीवन मूरी। राम कथा गावहिं श्रुति सूरी।। एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना। रघुपति भगति केर पंथाना।। अति हरि कृपा जाहि पर होई। पाउँ देइ एहिं मारग सोई।। मन कामना सिद्धि नर पावा। जे यह कथा कपट तजि गावा।। कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं। ते गोपद इव भवनिधि तरहीं।। सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई। गिरिजा बोली गिरा सुहाई।। नाथ कृपाँ मम गत संदेहा। राम चरन उपजेउ नव नेहा।।

दोहा 129

मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस। उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस।।129।।