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राम

3

अरण्यकाण्ड

Aranya Kanda

Life in the forest: encounters with sages, Surpanakha, the golden deer, Sita's abduction by Ravana.

98 verses

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Passage 1 of 5 · Verses 1–20 of 98

श्लोक 2

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।1।। सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे।।2।।

दोहा 1क

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।

चौपाई 1

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।। अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन।। एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए।। सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर।। सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा।। जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा।। सीता चरन चौंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा।। चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।

दोहा 1ख

अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।1।।

चौपाई 2

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।। धरि निज रुप गयउ पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।। भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा।। ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।। काहूँ बैठन कहा न ओही। राखि को सकइ राम कर द्रोही।। मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होइ बिष सुनु हरिजाना।। मित्र करइ सत रिपु कै करनी। ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी।। सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।। नारद देखा बिकल जयंता। लागि दया कोमल चित संता।। पठवा तुरत राम पहिं ताही। कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही।। आतुर सभय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।। अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।। निज कृत कर्म जनित फल पायउँ। अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ।। सुनि कृपाल अति आरत बानी। एकनयन करि तजा भवानी।।

दोहा 2

कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम।।2।।

चौपाई 3

रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।। बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहि भीर सबहिं मोहि जाना।। सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।। अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।। पुलकित गात अत्रि उठि धाए। देखि रामु आतुर चलि आए।। करत दंडवत मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।। करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।।

दोहा 3

प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत।।3।।

छन्द 1

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।। भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।। निकाम श्याम सुंदरं। भवाम्बुनाथ मंदरं।। प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं।। प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।। निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।। दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।। मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।। मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।। विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।। नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।। भजे सशक्ति सानुजं। शची पतिं प्रियानुजं।। त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सरा।। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले।। विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा।। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं।। तमेकमभ्दुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं।। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं।। भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।। अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमुर्विजा पतिं।। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।। पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता।।

दोहा 4

बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि।।4।।

चौपाई 4

अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता।। रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई।। दिब्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।। कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।। मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।। अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही।। धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।। बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अधं बधिर क्रोधी अति दीना।। ऐसेहु पति कर किएँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना।। एकइ धर्म एक ब्रत नेमा। कायँ बचन मन पति पद प्रेमा।। जग पति ब्रता चारि बिधि अहहिं। बेद पुरान संत सब कहहिं।। उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुँ आन पुरुष जग नाहीं।। मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैंसें।। धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।। बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई।। पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई।। छन सुख लागि जनम सत कोटि। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।। बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।। पति प्रतिकुल जनम जहँ जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।

दोहा 6

सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ। जसु गावत श्रुति चारि अजहु तुलसिका हरिहि प्रिय।।5(क)।। सुनु सीता तव नाम सुमिर नारि पतिब्रत करहि। तोहि प्रानप्रिय राम कहिउँ कथा संसार हित।।5(ख)।।

चौपाई 5

सुनि जानकीं परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।। तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होइ जाउँ बन आना।। संतत मो पर कृपा करेहू। सेवक जानि तजेहु जनि नेहू।। धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।। जासु कृपा अज सिव सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।। ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।। अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहि सब देव बिहाई।। जेहि समान अतिसय नहिं कोई। ता कर सील कस न अस होई।। केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अंतरजामी।। अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।

छन्द 2

तन पुलक निर्भर प्रेम पुरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दीख जप तप का किए।। जप जोग धर्म समूह तें नर भगति अनुपम पावई। रधुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।

दोहा 7क

कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुखमूल। सादर सुनहि जे तिन्ह पर राम रहहिं अनुकूल।।6(क)।। कठिन काल मल कोस धर्म न ग्यान न जोग जप। परिहरि सकल भरोस रामहि भजहिं ते चतुर नर।।6(ख)।।

चौपाई 6

मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।। आगे राम अनुज पुनि पाछें। मुनि बर बेष बने अति काछें।। उमय बीच श्री सोहइ कैसी। ब्रह्म जीव बिच माया जैसी।। सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानी देहिं बर बाटा।। जहँ जहँ जाहि देव रघुराया। करहिं मेध तहँ तहँ नभ छाया।। मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुवीर निपाता।। तुरतहिं रुचिर रूप तेहिं पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।। पुनि आए जहँ मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।

दोहा 7ख

देखी राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग। सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।7।।

चौपाई 7

कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।। जात रहेउँ बिरंचि के धामा। सुनेउँ श्रवन बन ऐहहिं रामा।। चितवत पंथ रहेउँ दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।। नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।। सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।। तब लगि रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहि तनु त्यागी।। जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हा। प्रभु कहँ देइ भगति बर लीन्हा।। एहि बिधि सर रचि मुनि सरभंगा। बैठे हृदयँ छाड़ि सब संगा।।

दोहा 8

सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु स्याम। मम हियँ बसहु निरंतर सगुनरुप श्रीराम।।8।।

चौपाई 8

अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा।। ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।। रिषि निकाय मुनिबर गति देखि। सुखी भए निज हृदयँ बिसेषी।। अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।। पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल सँग लागे।। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया।। जानतहुँ पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अंतरजामी।। निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए।।
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