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राम

7

उत्तरकाण्ड

Uttara Kanda

Ram's coronation, the nature of bhakti, and Shiva-Parvati's dialogue on devotion.

270 verses

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Passage 12 of 14 · Verses 221–240 of 270

चौपाई 102

एक बार गुर लीन्ह बोलाई। मोहि नीति बहु भाँति सिखाई।। सिव सेवा कर फल सुत सोई। अबिरल भगति राम पद होई।। रामहि भजहिं तात सिव धाता। नर पावँर कै केतिक बाता।। जासु चरन अज सिव अनुरागी। तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी।। हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ। सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ।। अधम जाति मैं बिद्या पाएँ। भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ।। मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती। गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती।। अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा। पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा।। जेहि ते नीच बड़ाई पावा। सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा।। धूम अनल संभव सुनु भाई। तेहि बुझाव घन पदवी पाई।। रज मग परी निरादर रहई। सब कर पद प्रहार नित सहई।। मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई। पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई।। सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा। बुध नहिं करहिं अधम कर संगा।। कबि कोबिद गावहिं असि नीती। खल सन कलह न भल नहिं प्रीती।। उदासीन नित रहिअ गोसाईं। खल परिहरिअ स्वान की नाईं।। मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई। गुर हित कहइ न मोहि सोहाई।।

दोहा 107

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम। गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम।।106(क)।। सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस।।106(ख)।।

चौपाई 103

मंदिर माझ भई नभ बानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी।। जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा।। तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही।। जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा।। जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं।। त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा।। बैठ रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी।। महा बिटप कोटर महुँ जाई।।रहु अधमाधम अधगति पाई।।

दोहा 108

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।। कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप।।107(क)।। करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि।।107(ख)।।

छन्द 13

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं। विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह। चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं।। निराकारमोंकारमूलं तुरीयं। गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं।। करालं महाकाल कालं कृपालं। गुणागार संसारपारं नतोऽहं।। तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं। मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं।। स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा। लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा।। चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं। प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं।। मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं। प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि।। प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं। अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं।। त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं। भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं।। कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी। सदा सज्जनान्ददाता पुरारी।। चिदानंदसंदोह मोहापहारी। प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी।। न यावद् उमानाथ पादारविन्दं। भजंतीह लोके परे वा नराणां।। न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं। प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं।। न जानामि योगं जपं नैव पूजां। नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं।। जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं। प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो।।

श्लोक 9

रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये। ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति।।9।।

दोहा 109

सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु। पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।। जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु। निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।। तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान। तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।। संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल। साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल।।108(घ)।।

चौपाई 104

एहि कर होइ परम कल्याना। सोइ करहु अब कृपानिधाना।। बिप्रगिरा सुनि परहित सानी। एवमस्तु इति भइ नभबानी।। जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा। मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा।। तदपि तुम्हार साधुता देखी। करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी।। छमासील जे पर उपकारी। ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी।। मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि। जन्म सहस अवस्य यह पाइहि।। जनमत मरत दुसह दुख होई। अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई।। कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना। सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना।। रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ। पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ।। पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें। राम भगति उपजिहि उर तोरें।। सुनु मम बचन सत्य अब भाई। हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई।। अब जनि करहि बिप्र अपमाना। जानेहु संत अनंत समाना।। इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला। कालदंड हरि चक्र कराला।। जो इन्ह कर मारा नहिं मरई। बिप्रद्रोह पावक सो जरई।। अस बिबेक राखेहु मन माहीं। तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। औरउ एक आसिषा मोरी। अप्रतिहत गति होइहि तोरी।।

दोहा 110

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि। मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि।।109(क)।। प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल। पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल।।109(ख)।। जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान। जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान।।109(ग)।। सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस। एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस।।109(घ)।।

चौपाई 105

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ। तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ।। एक सूल मोहि बिसर न काऊ। गुर कर कोमल सील सुभाऊ।। चरम देह द्विज कै मैं पाई। सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई।। खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला। करउँ सकल रघुनायक लीला।। प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा। समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा।। मन ते सकल बासना भागी। केवल राम चरन लय लागी।। कहु खगेस अस कवन अभागी। खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी।। प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई। हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई।। भए कालबस जब पितु माता। मैं बन गयउँ भजन जनत्राता।। जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ। आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ।। बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा। कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा।। सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा। अब्याहत गति संभु प्रसादा।। छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी। एक लालसा उर अति बाढ़ी।। राम चरन बारिज जब देखौं। तब निज जन्म सफल करि लेखौं।। जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई। ईस्वर सर्ब भूतमय अहई।। निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई। सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई।।

दोहा 111

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग। रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग।।110(क)।। मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन। देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन।।110(ख)।। सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज। मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज।।110(ग)।। तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान। सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान।।110(घ)।।

चौपाई 106

तब मुनिष रघुपति गुन गाथा। कहे कछुक सादर खगनाथा।। ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि। मोहि परम अधिकारी जानी।। लागे करन ब्रह्म उपदेसा। अज अद्वेत अगुन हृदयेसा।। अकल अनीह अनाम अरुपा। अनुभव गम्य अखंड अनूपा।। मन गोतीत अमल अबिनासी। निर्बिकार निरवधि सुख रासी।। सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा। बारि बीचि इव गावहि बेदा।। बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा। निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा।। पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा। सगुन उपासन कहहु मुनीसा।। राम भगति जल मम मन मीना। किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना।। सोइ उपदेस कहहु करि दाया। निज नयनन्हि देखौं रघुराया।। भरि लोचन बिलोकि अवधेसा। तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा।। मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा। खंडि सगुन मत अगुन निरूपा।। तब मैं निर्गुन मत कर दूरी। सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी।। उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा। मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा।। सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ। उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ।। अति संघरषन जौं कर कोई। अनल प्रगट चंदन ते होई।।

दोहा 112

-बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान। मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान।।111(क)।। क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान। मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान।।111(ख)।।

चौपाई 107

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें। तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें।। परद्रोही की होहिं निसंका। कामी पुनि कि रहहिं अकलंका।। बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें। कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें।। काहू सुमति कि खल सँग जामी। सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी।। भव कि परहिं परमात्मा बिंदक। सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक।। राजु कि रहइ नीति बिनु जानें। अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें।। पावन जस कि पुन्य बिनु होई। बिनु अघ अजस कि पावइ कोई।। लाभु कि किछु हरि भगति समाना। जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना।। हानि कि जग एहि सम किछु भाई। भजिअ न रामहि नर तनु पाई।। अघ कि पिसुनता सम कछु आना। धर्म कि दया सरिस हरिजाना।। एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ। मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ।। पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा। तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा।। मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि। उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि।। सत्य बचन बिस्वास न करही। बायस इव सबही ते डरही।। सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।। लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।

दोहा 113

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ। सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ।।112(क)।। उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध।। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध।।112(ख)।।

चौपाई 108

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।। कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी। लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी।। मन बच क्रम मोहि निज जन जाना। मुनि मति पुनि फेरी भगवाना।। रिषि मम महत सीलता देखी। राम चरन बिस्वास बिसेषी।। अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई। सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई।। मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा। हरषित राममंत्र तब दीन्हा।। बालकरूप राम कर ध्याना। कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना।। सुंदर सुखद मिहि अति भावा। सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा।। मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा। रामचरितमानस तब भाषा।। सादर मोहि यह कथा सुनाई। पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई।। रामचरित सर गुप्त सुहावा। संभु प्रसाद तात मैं पावा।। तोहि निज भगत राम कर जानी। ताते मैं सब कहेउँ बखानी।। राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।। मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।। निज कर कमल परसि मम सीसा। हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा।। राम भगति अबिरल उर तोरें। बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें।।

दोहा 114

-सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान। कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान।।113(क)।। जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत। ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत।।113(ख)।।

चौपाई 109

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ। कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ।। राम रहस्य ललित बिधि नाना। गुप्त प्रगट इतिहास पुराना।। बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ। नित नव नेह राम पद होऊ।। जो इच्छा करिहहु मन माहीं। हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।। सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा। ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा।। एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी। यह मम भगत कर्म मन बानी।। सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ। प्रेम मगन सब संसय गयऊ।। करि बिनती मुनि आयसु पाई। पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई।। हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ। प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ।। इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा। बीते कलप सात अरु बीसा।। करउँ सदा रघुपति गुन गाना। सादर सुनहिं बिहंग सुजाना।। जब जब अवधपुरीं रघुबीरा। धरहिं भगत हित मनुज सरीरा।। तब तब जाइ राम पुर रहऊँ। सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ।। पुनि उर राखि राम सिसुरूपा। निज आश्रम आवउँ खगभूपा।। कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई। काग देह जेहिं कारन पाई।। कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी। राम भगति महिमा अति भारी।।

दोहा 115

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह। निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह।।114(क)।। भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप। मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप।।114(ख)।।

चौपाई 110

जे असि भगति जानि परिहरहीं। केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं।। ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी। खोजत आकु फिरहिं पय लागी।। सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।। ते सठ महासिंधु बिनु तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।। सुनि भसुंडि के बचन भवानी। बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी।। तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं। संसय सोक मोह भ्रम नाहीं।। सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा। तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा।। एक बात प्रभु पूँछउँ तोही। कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही।। कहहिं संत मुनि बेद पुराना। नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना।। सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं। नहिं आदरेहु भगति की नाईं।। ग्यानहि भगतिहि अंतर केता। सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता।। सुनि उरगारि बचन सुख माना। सादर बोलेउ काग सुजाना।। भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा। उभय हरहिं भव संभव खेदा।। नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर। सावधान सोउ सुनु बिहंगबर।। ग्यान बिराग जोग बिग्याना। ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना।। पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती। अबला अबल सहज जड़ जाती।।
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