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राम

7

उत्तरकाण्ड

Uttara Kanda

Ram's coronation, the nature of bhakti, and Shiva-Parvati's dialogue on devotion.

270 verses

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Passage 11 of 14 · Verses 201–220 of 270

चौपाई 94

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा।। सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा। जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा।। राम बिमुख लहि बिधि सम देही। कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही।। राम भगति एहिं तन उर जामी। ताते मोहि परम प्रिय स्वामी।। तजउँ न तन निज इच्छा मरना। तन बिनु बेद भजन नहिं बरना।। प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा। राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा।। नाना जनम कर्म पुनि नाना। किए जोग जप तप मख दाना।। कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं। मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं।। देखेउँ करि सब करम गोसाई। सुखी न भयउँ अबहिं की नाई।। सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी। सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी।।

दोहा 97

प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस। सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस।।96(क)।। पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल।। नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल।।96(ख)।।

चौपाई 95

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई। जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई।। सिव सेवक मन क्रम अरु बानी। आन देव निंदक अभिमानी।। धन मद मत्त परम बाचाला। उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला।। जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी। तदपि न कछु महिमा तब जानी।। अब जाना मैं अवध प्रभावा। निगमागम पुरान अस गावा।। कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई। राम परायन सो परि होई।। अवध प्रभाव जान तब प्रानी। जब उर बसहिं रामु धनुपानी।। सो कलिकाल कठिन उरगारी। पाप परायन सब नर नारी।।

दोहा 98

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ। दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ।।97(क)।। भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म। सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म।।97(ख)।।

चौपाई 96

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी। श्रुति बिरोध रत सब नर नारी।। द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन। कोउ नहिं मान निगम अनुसासन।। मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा। पंडित सोइ जो गाल बजावा।। मिथ्यारंभ दंभ रत जोई। ता कहुँ संत कहइ सब कोई।। सोइ सयान जो परधन हारी। जो कर दंभ सो बड़ आचारी।। जौ कह झूँठ मसखरी जाना। कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना।। निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।। जाकें नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।

दोहा 99

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं। तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं।।98(क)।। जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ। मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ।।98(ख)।।

चौपाई 97

नारि बिबस नर सकल गोसाई। नाचहिं नट मर्कट की नाई।। सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना। मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना।। सब नर काम लोभ रत क्रोधी। देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी।। गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी। भजहिं नारि पर पुरुष अभागी।। सौभागिनीं बिभूषन हीना। बिधवन्ह के सिंगार नबीना।। गुर सिष बधिर अंध का लेखा। एक न सुनइ एक नहिं देखा।। हरइ सिष्य धन सोक न हरई। सो गुर घोर नरक महुँ परई।। मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं। उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं।।

दोहा 100

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात। कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात।।99(क)।। बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि। जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।।99(ख)।।

चौपाई 98

पर त्रिय लंपट कपट सयाने। मोह द्रोह ममता लपटाने।। तेइ अभेदबादी ग्यानी नर। देखा में चरित्र कलिजुग कर।। आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं। जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं।। कल्प कल्प भरि एक एक नरका। परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका।। जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।। नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।। ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।। बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।। सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।। सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।

दोहा 101

भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग। करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग।।100(क)।। श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक। तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक।।100(ख)।।

छन्द 11

बहु दाम सँवारहिं धाम जती। बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती।। तपसी धनवंत दरिद्र गृही। कलि कौतुक तात न जात कही।। कुलवंति निकारहिं नारि सती। गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती।। सुत मानहिं मातु पिता तब लौं। अबलानन दीख नहीं जब लौं।। ससुरारि पिआरि लगी जब तें। रिपरूप कुटुंब भए तब तें।। नृप पाप परायन धर्म नहीं। करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं।। धनवंत कुलीन मलीन अपी। द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी।। नहिं मान पुरान न बेदहि जो। हरि सेवक संत सही कलि सो।। कबि बृंद उदार दुनी न सुनी। गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी।। कलि बारहिं बार दुकाल परै। बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै।।

दोहा 102

सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड। मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड।।101(क)।। तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान। देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान।।101(ख)।।

छन्द 5

अबला कच भूषन भूरि छुधा। धनहीन दुखी ममता बहुधा।। सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता। मति थोरि कठोरि न कोमलता।।1।। नर पीड़ित रोग न भोग कहीं। अभिमान बिरोध अकारनहीं।। लघु जीवन संबतु पंच दसा। कलपांत न नास गुमानु असा।।2।। कलिकाल बिहाल किए मनुजा। नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा। नहिं तोष बिचार न सीतलता। सब जाति कुजाति भए मगता।।3।। इरिषा परुषाच्छर लोलुपता। भरि पूरि रही समता बिगता।। सब लोग बियोग बिसोक हुए। बरनाश्रम धर्म अचार गए।।4।। दम दान दया नहिं जानपनी। जड़ता परबंचनताति घनी।। तनु पोषक नारि नरा सगरे। परनिंदक जे जग मो बगरे।।5।।

दोहा 103

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार। गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार।।102(क)।। कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग। जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग।।102(ख)।।

चौपाई 99

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी। करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी।। त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं। प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं।। द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।। कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।। कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना। एक अधार राम गुन गाना।। सब भरोस तजि जो भज रामहि। प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि।। सोइ भव तर कछु संसय नाहीं। नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं।। कलि कर एक पुनीत प्रतापा। मानस पुन्य होहिं नहिं पापा।।

दोहा 104

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास। गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास।।103(क)।। प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान। जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान।।103(ख)।।

चौपाई 100

नित जुग धर्म होहिं सब केरे। हृदयँ राम माया के प्रेरे।। सुद्ध सत्व समता बिग्याना। कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना।। सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा। सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा।। बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस। द्वापर धर्म हरष भय मानस।। तामस बहुत रजोगुन थोरा। कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा।। बुध जुग धर्म जानि मन माहीं। तजि अधर्म रति धर्म कराहीं।। काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही। रघुपति चरन प्रीति अति जाही।। नट कृत बिकट कपट खगराया। नट सेवकहि न ब्यापइ माया।।

दोहा 105

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं। भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं।।104(क)।। तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस। परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस।।104(ख)।।

चौपाई 101

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।। गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।। बिप्र एक बैदिक सिव पूजा। करइ सदा तेहि काजु न दूजा।। परम साधु परमारथ बिंदक। संभु उपासक नहिं हरि निंदक।। तेहि सेवउँ मैं कपट समेता। द्विज दयाल अति नीति निकेता।। बाहिज नम्र देखि मोहि साईं। बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं।। संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा। सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा।। जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई। हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई।।

दोहा 106

मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह। हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह।।105(क)।। गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम। मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई।।105(ख)।।
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