Skip to main content
राम

6

लंकाकाण्ड

Lanka Kanda

The great battle between Ram's army and Ravana, and the victory of dharma.

273 verses

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 12 of 14 · Verses 221–240 of 273

दोहा 98

मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास। निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास।।98।।

चौपाई 99

तेही निसि सीता पहिं जाई। त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई।। सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी। सीता उर भइ त्रास घनेरी।। मुख मलीन उपजी मन चिंता। त्रिजटा सन बोली तब सीता।। होइहि कहा कहसि किन माता। केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता।। रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई। बिधि बिपरीत चरित सब करई।। मोर अभाग्य जिआवत ओही। जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही।। जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा। अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा।। जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए। लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए।। रघुपति बिरह सबिष सर भारी। तकि तकि मार बार बहु मारी।। ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना। सोइ बिधि ताहि जिआव न आना।। बहु बिधि कर बिलाप जानकी। करि करि सुरति कृपानिधान की।। कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी। उर सर लागत मरइ सुरारी।। प्रभु ताते उर हतइ न तेही। एहि के हृदयँ बसति बैदेही।।

छन्द 24

एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है। मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है।। सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा। अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा।।

दोहा 99

काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान। तब रावनहि हृदय महुँ मरिहहिं रामु सुजान।।99।।

चौपाई 100

अस कहि बहुत भाँति समुझाई। पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई।। राम सुभाउ सुमिरि बैदेही। उपजी बिरह बिथा अति तेही।। निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती। जुग सम भई सिराति न राती।। करति बिलाप मनहिं मन भारी। राम बिरहँ जानकी दुखारी।। जब अति भयउ बिरह उर दाहू। फरकेउ बाम नयन अरु बाहू।। सगुन बिचारि धरी मन धीरा। अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा।। इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा। निज सारथि सन खीझन लागा।। सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही। धिग धिग अधम मंदमति तोही।। तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा। भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा।। सुनि आगवनु दसानन केरा। कपि दल खरभर भयउ घनेरा।। जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी। धाए कटकटाइ भट भारी।।

छन्द 25

धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा। अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा।। बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो। चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो।।

दोहा 100

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार। अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार।।100।।

छन्द 2

जब कीन्ह तेहिं पाषंड। भए प्रगट जंतु प्रचंड।। बेताल भूत पिसाच। कर धरें धनु नाराच।।1।। जोगिनि गहें करबाल। एक हाथ मनुज कपाल।। करि सद्य सोनित पान। नाचहिं करहिं बहु गान।।2।। धरु मारु बोलहिं घोर। रहि पूरि धुनि चहुँ ओर।। मुख बाइ धावहिं खान। तब लगे कीस परान।।3।। जहँ जाहिं मर्कट भागि। तहँ बरत देखहिं आगि।। भए बिकल बानर भालु। पुनि लाग बरषै बालु।।4।। जहँ तहँ थकित करि कीस। गर्जेउ बहुरि दससीस।। लछिमन कपीस समेत। भए सकल बीर अचेत।।5।। हा राम हा रघुनाथ। कहि सुभट मीजहिं हाथ।। एहि बिधि सकल बल तोरि। तेहिं कीन्ह कपट बहोरि।।6।। प्रगटेसि बिपुल हनुमान। धाए गहे पाषान।। तिन्ह रामु घेरे जाइ। चहुँ दिसि बरूथ बनाइ।।7।। मारहु धरहु जनि जाइ। कटकटहिं पूँछ उठाइ।। दहँ दिसि लँगूर बिराज। तेहिं मध्य कोसलराज।।8।। तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही। जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही।। प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी। रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी।।1।। माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे। सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे।। श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं। सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं।।2।।

दोहा 102क

ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास। जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास।।101(क)।। काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस। प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस।।101(ख)।।

चौपाई 101

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई।। मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा।। उमा काल मर जाकीं ईछा। सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा।। सुनु सरबग्य चराचर नायक। प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक।। नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें।। सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला।। असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना।। बोलहि खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू।। दस दिसि दाह होन अति लागा। भयउ परब बिनु रबि उपरागा।। मंदोदरि उर कंपति भारी। प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी।।

छन्द 27

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही। बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही।। उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जए। सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए।।

दोहा 102ख

खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस।।102।।

चौपाई 102

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा।। लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा।। धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा।। गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी।। डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर।। धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई।। मंदोदरि आगें भुज सीसा। धरि सर चले जहाँ जगदीसा।। प्रबिसे सब निषंग महु जाई। देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई।। तासु तेज समान प्रभु आनन। हरषे देखि संभु चतुरानन।। जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा। जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा।। बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा।।

छन्द 28

जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो। खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो।। सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही। संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही।। सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं।। भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने।।

दोहा 103

कृपादृष्टि करि प्रभु अभय किए सुर बृंद। भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद।।103।।

चौपाई 103

पति सिर देखत मंदोदरी। मुरुछित बिकल धरनि खसि परी।। जुबति बृंद रोवत उठि धाईं। तेहि उठाइ रावन पहिं आई।। पति गति देखि ते करहिं पुकारा। छूटे कच नहिं बपुष सँभारा।। उर ताड़ना करहिं बिधि नाना। रोवत करहिं प्रताप बखाना।। तव बल नाथ डोल नित धरनी। तेज हीन पावक ससि तरनी।। सेष कमठ सहि सकहिं न भारा। सो तनु भूमि परेउ भरि छारा।। बरुन कुबेर सुरेस समीरा। रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा।। भुजबल जितेहु काल जम साईं। आजु परेहु अनाथ की नाईं।। जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई। सुत परिजन बल बरनि न जाई।। राम बिमुख अस हाल तुम्हारा। रहा न कोउ कुल रोवनिहारा।। तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा। सभय दिसिप नित नावहिं माथा।। अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं। राम बिमुख यह अनुचित नाहीं।। काल बिबस पति कहा न माना। अग जग नाथु मनुज करि जाना।।

छन्द 29

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं। जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं।। आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं। तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं।।

दोहा 104

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन। जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान।।104।।

चौपाई 104

मंदोदरी बचन सुनि काना। सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना।। अज महेस नारद सनकादी। जे मुनिबर परमारथबादी।। भरि लोचन रघुपतिहि निहारी। प्रेम मगन सब भए सुखारी।। रुदन करत देखीं सब नारी। गयउ बिभीषनु मन दुख भारी।। बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा। तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा।। लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो। बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो।। कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका। करहु क्रिया परिहरि सब सोका।। कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी। बिधिवत देस काल जियँ जानी।।

दोहा 105

मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि। भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि।।105।।
Continue reading →