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राम

6

लंकाकाण्ड

Lanka Kanda

The great battle between Ram's army and Ravana, and the victory of dharma.

273 verses

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Passage 13 of 14 · Verses 241–260 of 273

चौपाई 105

आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो। कृपासिंधु तब अनुज बोलायो।। तुम्ह कपीस अंगद नल नीला। जामवंत मारुति नयसीला।। सब मिलि जाहु बिभीषन साथा। सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा।। पिता बचन मैं नगर न आवउँ। आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ।। तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना। कीन्ही जाइ तिलक की रचना।। सादर सिंहासन बैठारी। तिलक सारि अस्तुति अनुसारी।। जोरि पानि सबहीं सिर नाए। सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए।। तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे। कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे।।

छन्द 30

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो। पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो।। मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं। संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं।।

दोहा 106

प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज। बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज।।106।।

चौपाई 106

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना। लंका जाहु कहेउ भगवाना।। समाचार जानकिहि सुनावहु। तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु।। तब हनुमंत नगर महुँ आए। सुनि निसिचरी निसाचर धाए।। बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही। जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही।। दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा। रघुपति दूत जानकीं चीन्हा।। कहहु तात प्रभु कृपानिकेता। कुसल अनुज कपि सेन समेता।। सब बिधि कुसल कोसलाधीसा। मातु समर जीत्यो दससीसा।। अबिचल राजु बिभीषन पायो। सुनि कपि बचन हरष उर छायो।।

छन्द 31

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा। का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा।। सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं। रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं।।

दोहा 107

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत। सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत।।107।।

चौपाई 107

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता। देखौं नयन स्याम मृदु गाता।। तब हनुमान राम पहिं जाई। जनकसुता कै कुसल सुनाई।। सुनि संदेसु भानुकुलभूषन। बोलि लिए जुबराज बिभीषन।। मारुतसुत के संग सिधावहु। सादर जनकसुतहि लै आवहु।। तुरतहिं सकल गए जहँ सीता। सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता।। बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो। तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो।। बहु प्रकार भूषन पहिराए। सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए।। ता पर हरषि चढ़ी बैदेही। सुमिरि राम सुखधाम सनेही।। बेतपानि रच्छक चहुँ पासा। चले सकल मन परम हुलासा।। देखन भालु कीस सब आए। रच्छक कोपि निवारन धाए।। कह रघुबीर कहा मम मानहु। सीतहि सखा पयादें आनहु।। देखहुँ कपि जननी की नाईं। बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई।। सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे। नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे।। सीता प्रथम अनल महुँ राखी। प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी।।

दोहा 108

तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद। सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद।।108।।

चौपाई 108

प्रभु के बचन सीस धरि सीता। बोली मन क्रम बचन पुनीता।। लछिमन होहु धरम के नेगी। पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी।। सुनि लछिमन सीता कै बानी। बिरह बिबेक धरम निति सानी।। लोचन सजल जोरि कर दोऊ। प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ।। देखि राम रुख लछिमन धाए। पावक प्रगटि काठ बहु लाए।। पावक प्रबल देखि बैदेही। हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही।। जौं मन बच क्रम मम उर माहीं। तजि रघुबीर आन गति नाहीं।। तौ कृसानु सब कै गति जाना। मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना।।

छन्द 2

श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली। जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली।। प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे। प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे।।1।। धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो। जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो।। सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली। नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली।।2।।

दोहा 110क

बरषहिं सुमन हरषि सुन बाजहिं गगन निसान। गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान।।109(क)।। जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार। देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार।।109(ख)।।

चौपाई 109

तब रघुपति अनुसासन पाई। मातलि चलेउ चरन सिरु नाई।। आए देव सदा स्वारथी। बचन कहहिं जनु परमारथी।। दीन बंधु दयाल रघुराया। देव कीन्हि देवन्ह पर दाया।। बिस्व द्रोह रत यह खल कामी। निज अघ गयउ कुमारगगामी।। तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी। सदा एकरस सहज उदासी।। अकल अगुन अज अनघ अनामय। अजित अमोघसक्ति करुनामय।। मीन कमठ सूकर नरहरी। बामन परसुराम बपु धरी।। जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो। नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो।। यह खल मलिन सदा सुरद्रोही। काम लोभ मद रत अति कोही।। अधम सिरोमनि तव पद पावा। यह हमरे मन बिसमय आवा।। हम देवता परम अधिकारी। स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी।। भव प्रबाहँ संतत हम परे। अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे।।

दोहा 110ख

करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि। अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि।।110।।

छन्द 33

जय राम सदा सुखधाम हरे। रघुनायक सायक चाप धरे।। भव बारन दारन सिंह प्रभो। गुन सागर नागर नाथ बिभो।। तन काम अनेक अनूप छबी। गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी।। जसु पावन रावन नाग महा। खगनाथ जथा करि कोप गहा।। जन रंजन भंजन सोक भयं। गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं।। अवतार उदार अपार गुनं। महि भार बिभंजन ग्यानघनं।। अज ब्यापकमेकमनादि सदा। करुनाकर राम नमामि मुदा।। रघुबंस बिभूषन दूषन हा। कृत भूप बिभीषन दीन रहा।। गुन ग्यान निधान अमान अजं। नित राम नमामि बिभुं बिरजं।। भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं। खल बृंद निकंद महा कुसलं।। बिनु कारन दीन दयाल हितं। छबि धाम नमामि रमा सहितं।। भव तारन कारन काज परं। मन संभव दारुन दोष हरं।। सर चाप मनोहर त्रोन धरं। जरजारुन लोचन भूपबरं।। सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं। मद मार मुधा ममता समनं।। अनवद्य अखंड न गोचर गो। सबरूप सदा सब होइ न गो।। इति बेद बदंति न दंतकथा। रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा।। कृतकृत्य बिभो सब बानर ए। निरखंति तवानन सादर ए।। धिग जीवन देव सरीर हरे। तव भक्ति बिना भव भूलि परे।। अब दीन दयाल दया करिऐ। मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ।। जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ। दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ।। खल खंडन मंडन रम्य छमा। पद पंकज सेवित संभु उमा।। नृप नायक दे बरदानमिदं। चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं।।

दोहा 111

बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात। सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात।।111।।

चौपाई 110

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए। तनय बिलोकि नयन जल छाए।। अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा। आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा।। तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ। जीत्यों अजय निसाचर राऊ।। सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी। नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी।। रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना। चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना।। ताते उमा मोच्छ नहिं पायो। दसरथ भेद भगति मन लायो।। सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं। तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं।। बार बार करि प्रभुहि प्रनामा। दसरथ हरषि गए सुरधामा।।

दोहा 112

अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस। सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस।।112।।

छन्द 8

जय राम सोभा धाम। दायक प्रनत बिश्राम।। धृत त्रोन बर सर चाप। भुजदंड प्रबल प्रताप।।1।। जय दूषनारि खरारि। मर्दन निसाचर धारि।। यह दुष्ट मारेउ नाथ। भए देव सकल सनाथ।।2।। जय हरन धरनी भार। महिमा उदार अपार।। जय रावनारि कृपाल। किए जातुधान बिहाल।।3।। लंकेस अति बल गर्ब। किए बस्य सुर गंधर्ब।। मुनि सिद्ध नर खग नाग। हठि पंथ सब कें लाग।।4।। परद्रोह रत अति दुष्ट। पायो सो फलु पापिष्ट।। अब सुनहु दीन दयाल। राजीव नयन बिसाल।।5।। मोहि रहा अति अभिमान। नहिं कोउ मोहि समान।। अब देखि प्रभु पद कंज। गत मान प्रद दुख पुंज।।6।। कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव। अब्यक्त जेहि श्रुति गाव।। मोहि भाव कोसल भूप। श्रीराम सगुन सरूप।।7।। बैदेहि अनुज समेत। मम हृदयँ करहु निकेत।। मोहि जानिए निज दास। दे भक्ति रमानिवास।।8।। दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं। सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं।। सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं। ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं।।

दोहा 113

अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल। काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल।।113।।

चौपाई 111

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे। परे भूमि निसचरन्हि जे मारे।। मम हित लागि तजे इन्ह प्राना। सकल जिआउ सुरेस सुजाना।। सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी। अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी।। प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई। केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई।। सुधा बरषि कपि भालु जिआए। हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए।। सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर। जिए भालु कपि नहिं रजनीचर।। रामाकार भए तिन्ह के मन। मुक्त भए छूटे भव बंधन।। सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा। जिए सकल रघुपति कीं ईछा।। राम सरिस को दीन हितकारी। कीन्हे मुकुत निसाचर झारी।। खल मल धाम काम रत रावन। गति पाई जो मुनिबर पाव न।।
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