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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 6 of 39 · Verses 101–120 of 770

दोहा 44

ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग। कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग।।44।।

चौपाई 45

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं।। प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा।। एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए।। जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरव्दाज राखे पद टेकी।। सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे।। करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी।। नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें।। कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा।।

दोहा 45

संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव। होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव।।45।।

चौपाई 46

अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू।। राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा।। संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी।। आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं।। सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया।। रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही।। एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा।। नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा।।

दोहा 46

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि। सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि।।46।।

चौपाई 47

जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी।। जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई।। राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी।। चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा।। तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई।। महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला।। रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना।। ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी।।

दोहा 47

कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद। भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद।।47।।

चौपाई 48

एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं।। संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी।। रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी।। रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई।। कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा।। मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी।। तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा।। पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी।।

सोरठा 48

ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ। गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ।।48(क)।। संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।। तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची।।48(ख)।।

चौपाई 49

रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा।। जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा।। एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेहि समय जाइ दससीसा।। लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा।। करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही।। मृग बधि बन्धु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए।। बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई।। कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुख ताकें।।

दोहा 49

अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान। जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन।।49।।

चौपाई 50

संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा।। भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी।। जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन।। चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता।। सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी।। संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा।। तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधमा।। भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी।।

दोहा 50

ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद। सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद।। 50।।

चौपाई 51

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी।। खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी।। संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई।। अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा।। जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी।। सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ।। जासु कथा कुभंज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई।। सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा।।

छन्द 2

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं। कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं।। सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी। अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि।।

दोहा 51

लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु। बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ।।51।।

चौपाई 52

जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू।। तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही।। जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी।। चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई।। इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना।। मोरेहु कहें न संसय जाहीं। बिधी बिपरीत भलाई नाहीं।। होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।। अस कहि लगे जपन हरिनामा। गई सती जहँ प्रभु सुखधामा।।

दोहा 52

पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप। आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप।।52।।

चौपाई 53

लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा।। कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा।। सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी।। सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना।। सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ।। निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी।। जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू।। कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू।।

दोहा 53

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु। सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु।।53।।
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