Skip to main content
राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

Explore illustrated passages (716)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 7 of 39 · Verses 121–140 of 770

चौपाई 54

मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना।। जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा।। जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा।। सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता।। फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर वेषा।। जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना।। देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका।। बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा।।

दोहा 54

सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप। जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप।।54।।

चौपाई 55

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते।। जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा।। पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा।। अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे।। सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भई सभीता।। हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं।। बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी।। पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा।।

दोहा 55

गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात। लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात।।55।।

चौपाई 56

सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।। कछु न परीछा लीन्हि गोसाई। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाई।। जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई।। तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना।। बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा।। हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना।। सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।। जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती।।

दोहा 56

परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु।।56।।

चौपाई 57

तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।। एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं।। अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।। चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।। अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना।। सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।। कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला।। जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती।।

सोरठा 57

सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य।।57क।। जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।57ख।।

चौपाई 58

हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी।। कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा।। संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।। निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई।। सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू।। बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।। तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन।। संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।

दोहा 58

सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।58।।

चौपाई 59

नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।। मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनिपति बचनु मृषा करि जाना।। सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।। अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।। कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामाहि सुमिर सयानी।। जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा।। तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।। जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू।।

दोहा 59

तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।59।।

चौपाई 60

एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।। बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी।। राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे।। जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा।। लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला।। देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक।। बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा।। नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।

दोहा 60

दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग। नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।60।।

चौपाई 61

किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा।। बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।। सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना।। सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना।। पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी।। जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कुछ दिन जाइ रहौं मिस एहीं।। पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी।। बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।

दोहा 61

पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौ मै जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।61।।

चौपाई 62

कहेहु नीक मोरेहुँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा।। दच्छ सकल निज सुता बोलाई। हमरें बयर तुम्हउ बिसराई।। ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना।। जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।। जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा।। तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई।। भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा।। कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।

दोहा 62

कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।62।।

चौपाई 63

पिता भवन जब गई भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।। सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।। दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता।। सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।। तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।। पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा।। जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना।। समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा।।

दोहा 63

सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध।।63।।
Continue reading →