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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 5 of 39 · Verses 81–100 of 770

दोहा 34

मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर। जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर।।34।।

चौपाई 35

दरस परस मज्जन अरु पाना। हरइ पाप कह बेद पुराना।। नदी पुनीत अमित महिमा अति। कहि न सकइ सारद बिमलमति।। राम धामदा पुरी सुहावनि। लोक समस्त बिदित अति पावनि।। चारि खानि जग जीव अपारा। अवध तजे तनु नहि संसारा।। सब बिधि पुरी मनोहर जानी। सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी।। बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा। सुनत नसाहिं काम मद दंभा।। रामचरितमानस एहि नामा। सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा।। मन करि विषय अनल बन जरई। होइ सुखी जौ एहिं सर परई।। रामचरितमानस मुनि भावन। बिरचेउ संभु सुहावन पावन।। त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन। कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन।। रचि महेस निज मानस राखा। पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा।। तातें रामचरितमानस बर। धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर।। कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई। सादर सुनहु सुजन मन लाई।।

दोहा 35

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु। अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु।।35।।

चौपाई 36

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी। रामचरितमानस कबि तुलसी।। करइ मनोहर मति अनुहारी। सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी।। सुमति भूमि थल हृदय अगाधू। बेद पुरान उदधि घन साधू।। बरषहिं राम सुजस बर बारी। मधुर मनोहर मंगलकारी।। लीला सगुन जो कहहिं बखानी। सोइ स्वच्छता करइ मल हानी।। प्रेम भगति जो बरनि न जाई। सोइ मधुरता सुसीतलताई।। सो जल सुकृत सालि हित होई। राम भगत जन जीवन सोई।। मेधा महि गत सो जल पावन। सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन।। भरेउ सुमानस सुथल थिराना। सुखद सीत रुचि चारु चिराना।।

दोहा 36

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि। तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि।।36।।

चौपाई 37

सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना। ग्यान नयन निरखत मन माना।। रघुपति महिमा अगुन अबाधा। बरनब सोइ बर बारि अगाधा।। राम सीय जस सलिल सुधासम। उपमा बीचि बिलास मनोरम।। पुरइनि सघन चारु चौपाई। जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई।। छंद सोरठा सुंदर दोहा। सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा।। अरथ अनूप सुमाव सुभासा। सोइ पराग मकरंद सुबासा।। सुकृत पुंज मंजुल अलि माला। ग्यान बिराग बिचार मराला।। धुनि अवरेब कबित गुन जाती। मीन मनोहर ते बहुभाँती।। अरथ धरम कामादिक चारी। कहब ग्यान बिग्यान बिचारी।। नव रस जप तप जोग बिरागा। ते सब जलचर चारु तड़ागा।। सुकृती साधु नाम गुन गाना। ते बिचित्र जल बिहग समाना।। संतसभा चहुँ दिसि अवँराई। श्रद्धा रितु बसंत सम गाई।। भगति निरुपन बिबिध बिधाना। छमा दया दम लता बिताना।। सम जम नियम फूल फल ग्याना। हरि पत रति रस बेद बखाना।। औरउ कथा अनेक प्रसंगा। तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा।।

दोहा 37

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु। माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु।।37।।

चौपाई 38

जे गावहिं यह चरित सँभारे। तेइ एहि ताल चतुर रखवारे।। सदा सुनहिं सादर नर नारी। तेइ सुरबर मानस अधिकारी।। अति खल जे बिषई बग कागा। एहिं सर निकट न जाहिं अभागा।। संबुक भेक सेवार समाना। इहाँ न बिषय कथा रस नाना।। तेहि कारन आवत हियँ हारे। कामी काक बलाक बिचारे।। आवत एहिं सर अति कठिनाई। राम कृपा बिनु आइ न जाई।। कठिन कुसंग कुपंथ कराला। तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला।। गृह कारज नाना जंजाला। ते अति दुर्गम सैल बिसाला।। बन बहु बिषम मोह मद माना। नदीं कुतर्क भयंकर नाना।।

दोहा 38

जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ। तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ।।38।।

चौपाई 39

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई। जातहिं नींद जुड़ाई होई।। जड़ता जाड़ बिषम उर लागा। गएहुँ न मज्जन पाव अभागा।। करि न जाइ सर मज्जन पाना। फिरि आवइ समेत अभिमाना।। जौं बहोरि कोउ पूछन आवा। सर निंदा करि ताहि बुझावा।। सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही। राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही।। सोइ सादर सर मज्जनु करई। महा घोर त्रयताप न जरई।। ते नर यह सर तजहिं न काऊ। जिन्ह के राम चरन भल भाऊ।। जो नहाइ चह एहिं सर भाई। सो सतसंग करउ मन लाई।। अस मानस मानस चख चाही। भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही।। भयउ हृदयँ आनंद उछाहू। उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू।। चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो।। सरजू नाम सुमंगल मूला। लोक बेद मत मंजुल कूला।। नदी पुनीत सुमानस नंदिनि। कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि।।

दोहा 39

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल। संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल।।39।।

चौपाई 40

रामभगति सुरसरितहि जाई। मिली सुकीरति सरजु सुहाई।। सानुज राम समर जसु पावन। मिलेउ महानदु सोन सुहावन।। जुग बिच भगति देवधुनि धारा। सोहति सहित सुबिरति बिचारा।। त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी। राम सरुप सिंधु समुहानी।। मानस मूल मिली सुरसरिही। सुनत सुजन मन पावन करिही।। बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा। जनु सरि तीर तीर बन बागा।। उमा महेस बिबाह बराती। ते जलचर अगनित बहुभाँती।। रघुबर जनम अनंद बधाई। भवँर तरंग मनोहरताई।।

दोहा 40

बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग। नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग।।40।।

चौपाई 41

सीय स्वयंबर कथा सुहाई। सरित सुहावनि सो छबि छाई।। नदी नाव पटु प्रस्न अनेका। केवट कुसल उतर सबिबेका।। सुनि अनुकथन परस्पर होई। पथिक समाज सोह सरि सोई।। घोर धार भृगुनाथ रिसानी। घाट सुबद्ध राम बर बानी।। सानुज राम बिबाह उछाहू। सो सुभ उमग सुखद सब काहू।। कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं। ते सुकृती मन मुदित नहाहीं।। राम तिलक हित मंगल साजा। परब जोग जनु जुरे समाजा।। काई कुमति केकई केरी। परी जासु फल बिपति घनेरी।।

दोहा 41

समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग। कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग।।41।।

चौपाई 42

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी। समय सुहावनि पावनि भूरी।। हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू। सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू।। बरनब राम बिबाह समाजू। सो मुद मंगलमय रितुराजू।। ग्रीषम दुसह राम बनगवनू। पंथकथा खर आतप पवनू।। बरषा घोर निसाचर रारी। सुरकुल सालि सुमंगलकारी।। राम राज सुख बिनय बड़ाई। बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई।। सती सिरोमनि सिय गुनगाथा। सोइ गुन अमल अनूपम पाथा।। भरत सुभाउ सुसीतलताई। सदा एकरस बरनि न जाई।।

दोहा 42

अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास। भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास।।42।।

चौपाई 43

आरति बिनय दीनता मोरी। लघुता ललित सुबारि न थोरी।। अदभुत सलिल सुनत गुनकारी। आस पिआस मनोमल हारी।। राम सुप्रेमहि पोषत पानी। हरत सकल कलि कलुष गलानी।। भव श्रम सोषक तोषक तोषा। समन दुरित दुख दारिद दोषा।। काम कोह मद मोह नसावन। बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन।। सादर मज्जन पान किए तें। मिटहिं पाप परिताप हिए तें।। जिन्ह एहि बारि न मानस धोए। ते कायर कलिकाल बिगोए।। तृषित निरखि रबि कर भव बारी। फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी।।

सोरठा 43

मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ। सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ।।43(क)।। अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद । कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद।।43(ख)।।

चौपाई 44

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा।। तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना।। माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई।। देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं।। पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता।। भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन।। तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा।। मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा।।
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