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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 38 of 39 · Verses 741–760 of 770

दोहा 347

होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ। बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।347।।

चौपाई 345

मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।। जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।। बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।। बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।। पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे।। करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।। आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी।। सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।

दोहा 348

एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परुछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।348।।

चौपाई 346

करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।। भूषन मनि पट नाना जाती।।करही निछावरि अगनित भाँती।। बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी।। पुनि पुनि सीय राम छबि देखी।।मुदित सफल जग जीवन लेखी।। सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही।। बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।। देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं।। देत न बनहिं निपट लघु लागी। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।

दोहा 349

निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत। बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत।।349।।

चौपाई 347

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।। तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे।। धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि।। बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं।। बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।। पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं।। जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।। मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई।।

सोरठा 350

एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।350(क)।। लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं।।350(ख)।।

चौपाई 348

देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।। सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।। अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।। भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।। आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।। पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।। जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।। सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।

दोहा 351

देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ। तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।

चौपाई 349

जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।। भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।। पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए।। आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।। बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।। कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।। भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू।। पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।

दोहा 352

बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु। पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।

चौपाई 350

बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।। नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।। उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।। बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई।। बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं।। नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं।। प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।। देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।

दोहा 353

चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।

चौपाई 351

सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।। जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।। लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।। बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।। देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू।। कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू।। जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।। बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।

दोहा 354

सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।

चौपाई 352

मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।। अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।। रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।। प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।। कहि न सकहि सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।। सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी।। नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी।। बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई।।

दोहा 355

लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ। अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।

चौपाई 353

भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।। सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।। उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।। रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।। सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।। अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।। देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।। मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।

दोहा 356

घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।

चौपाई 354

मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।। मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।। मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।। कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।। बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।। सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।। आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।। जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
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