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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 37 of 39 · Verses 721–740 of 770

दोहा 337

प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु।।337।।

चौपाई 335

सुक सारिका जानकी ज्याए। कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए।। ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ न केही।। भए बिकल खग मृग एहि भाँति। मनुज दसा कैसें कहि जाती।। बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।। सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।। लीन्हि राँय उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।। समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।। बारहिं बार सुता उर लाई। सजि सुंदर पालकीं मगाई।।

दोहा 338

प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुँअरि चढ़ाई पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।338।।

चौपाई 336

बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई।। दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।। सीय चलत ब्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।। भूसुर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।। समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।। दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।। चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।। सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।

दोहा 339

सुर प्रसून बरषहि हरषि करहिं अपछरा गान। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।339।।

चौपाई 337

नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।। भूषन बसन बाजि गज दीन्हे। प्रेम पोषि ठाढ़े सब कीन्हे।। बार बार बिरिदावलि भाषी। फिरे सकल रामहि उर राखी।। बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनकु प्रेमबस फिरै न चहहीं।। पुनि कह भूपति बचन सुहाए। फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए।। राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े।। तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधाँ जनु बोरी।। करौ कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्हि बड़ाई।।

दोहा 340

कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति। मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति।।340।।

चौपाई 338

मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहि सन पावा।। सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।। जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन प्रेम जनु जाए।। राम करौ केहि भाँति प्रसंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।। करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी।। ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी।। मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी।। महिमा निगमु नेति कहि कहई। जो तिहुँ काल एकरस रहई।।

दोहा 341

नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल। सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकुल।।341।।

चौपाई 339

सबहि भाँति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।। होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कलप कोटिक भरि लेखा।। मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहि न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।। मै कछु कहउँ एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु सनेह सुठि थोरें।। बार बार मागउँ कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।। सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।। करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ सम जाने।। बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेमु पुनि आसिष दीन्ही।।

दोहा 342

मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस। भए परस्पर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।342।।

चौपाई 340

बार बार करि बिनय बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।। जनक गहे कौसिक पद जाई। चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।। सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।। जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहीं।। सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।। कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।। चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।। रामहि निरखि ग्राम नर नारी। पाइ नयन फलु होहिं सुखारी।।

दोहा 343

बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत। अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत।।343।।

चौपाई 341

हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।। झाँझि बिरव डिंडमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।। पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।। निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।। गलीं सकल अरगजाँ सिंचाई। जहँ तहँ चौकें चारु पुराई।। बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना।। सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।। लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी।।

दोहा 344

बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि। सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि।।344।।

चौपाई 342

भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।। मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।। जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ दसरथ गृहँ छाए।। देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।। जुथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासनि।। सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती।। भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।। कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।

दोहा 345

दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारी। प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि।।345।।

चौपाई 343

मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।। राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं।। बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे।। हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।। अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।। छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए।। सगुन सुंगध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।। रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।

दोहा 346

कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात। चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात।।346।।

चौपाई 344

धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ।। सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं।। मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे।। प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि।। दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा।। सुर सुगन्ध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।। समउ जानी गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा।। सुमिरि संभु गिरजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा।।
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