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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 39 of 39 · Verses 761–770 of 770

दोहा 357

राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।

चौपाई 355

नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।। घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।। पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।। सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।। प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।। बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।। बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।। जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।

दोहा 358

कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।

चौपाई 356

भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।। देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।। पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।। सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।। कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।। मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।। बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।। सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।

दोहा 359

मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।

चौपाई 357

सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।। नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।। बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।। दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।। मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।। नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।। करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।। अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।। दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।। रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।

दोहा 360

राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।

चौपाई 358

बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।। सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।। बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।। जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।। आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।। प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।। कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।। तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।

छन्द 39

निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो।। उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।

दोहा 361

सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।361।।