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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 36 of 39 · Verses 701–720 of 770

चौपाई 325

पुनि जेवनार भई बहु भाँती। पठए जनक बोलाइ बराती।। परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।। सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे।। धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहिं बरना।। बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।। तीनिउ भाई राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।। आसन उचित सबहि नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।। सादर लगे परन पनवारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।

दोहा 328

सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत। छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।328।।

चौपाई 326

पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।। भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।। परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।। चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।। छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती।। जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम पुरुष अरु नारी।। समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।। एहि बिधि सबहीं भौजनु कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।

दोहा 329

देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।329।।

चौपाई 327

नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।। बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।। देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।। प्रातक्रिया करि गे गुरु पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।। करि प्रनाम पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।। तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आजु मैं पूरनकाजा।। अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाई।। सुनि गुर करि महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनि बृंद बोलाई।।

दोहा 330

बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।330।।

चौपाई 328

दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।। चारि लच्छ बर धेनु मगाई। कामसुरभि सम सील सुहाई।। सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महिप महिदेवन्ह दीन्हीं।। करत बिनय बहु बिधि नरनाहू। लहेउँ आजु जग जीवन लाहू।। पाइ असीस महीसु अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।। कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन।। चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकर कुल नाथा।। एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।

दोहा 331

बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।331।।

चौपाई 329

जनक सनेहु सीलु करतूती। नृपु सब भाँति सराह बिभूती।। दिन उठि बिदा अवधपति मागा। राखहिं जनकु सहित अनुरागा।। नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।। नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।। बहुत दिवस बीते एहि भाँती। जनु सनेह रजु बँधे बराती।। कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहि समुझाई।। अब दसरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।। भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जय जीव सीस तिन्ह नाए।।

दोहा 332

अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।332।।

चौपाई 330

पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।। सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।। जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।। बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।। भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठई जनक अनेक सुसारा।। तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।। मत्त सहस दस सिंधुर साजे। जिन्हहि देखि दिसिकुंजर लाजे।। कनक बसन मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।

दोहा 333

दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।333।।

चौपाई 331

सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई।। चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं।। पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।। होएहु संतत पियहि पिआरी। चिरु अहिबात असीस हमारी।। सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।। अति सनेह बस सखीं सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।। सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाई।। बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।

दोहा 334

तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।334।।

चौपाई 332

चारिअ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।। कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।। लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।। को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।। मरनसीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।। पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसे।। निरखि राम सोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।। एहि बिधि सबहि नयन फलु देता। गए कुअँर सब राज निकेता।।

दोहा 335

रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहि निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।335।।

चौपाई 333

देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेमबिबस पुनि पुनि पद लागीं।। रही न लाज प्रीति उर छाई। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।। भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।। बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।। राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।। मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।। सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।। हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।

छन्द 38

करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाँउ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै।। परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।

दोहा 336

तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन।।336।।

चौपाई 334

अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।। सुनि सनेहसानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।। राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी।। पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।। मंजु मधुर मूरति उर आनी। भई सनेह सिथिल सब रानी।। पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारी। बार बार भेटहिं महतारीं।। पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।। पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।
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