सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु।।274।।1
बालकाण्ड
Bala Kanda
The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.
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Passage 30 of 39 · Verses 581–600 of 770
तुम्ह तौ कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।।
सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।
अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।।
बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।
कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।।
खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।
उतर देत छोड़उँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।।
न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहि उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।Transliteration
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गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
अयमय खाँड न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ।।275।।Transliteration
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कहेउ लखन मुनि सीलु तुम्हारा। को नहि जान बिदित संसारा।।
माता पितहि उरिन भए नीकें। गुर रिनु रहा सोचु बड़ जीकें।।
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।।
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।
सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।।
भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।।
मिले न कबहुँ सुभट रन गाढ़े। द्विज देवता घरहि के बाढ़े।।
अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखनु नेवारे।।Transliteration
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लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।276।।Transliteration
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नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।।
जौं पै प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौ कि बराबरि करत अयाना।।
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।।
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी।।
राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसकाने।।
हँसत देखि नख सिख रिस ब्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।
गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।।
सहज टेढ़ अनुहरइ न तोही। नीचु मीचु सम देख न मौहीं।।Transliteration
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लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल।।277।।Transliteration
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मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।।
टूट चाप नहिं जुरहि रिसाने। बैठिअ होइहिं पाय पिराने।।
जौ अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई।।
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं।।
थर थर कापहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।।
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी। रिस तन जरइ होइ बल हानी।।
बोले रामहि देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।।
मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसैं।।Transliteration
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सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।278।।Transliteration
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अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।।
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।
बररै बालक एकु सुभाऊ। इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ।।
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी में नाथ तुम्हारा।।
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई।।
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें।।
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा। तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा।।Transliteration
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गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।279।।Transliteration
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बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।।
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।।
आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा।।
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला।।
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु राख बिधाता।।
देखु जनक हठि बालक एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृप ढोटा।।
बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।Transliteration
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परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु।।280।।Transliteration
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बंधु कहइ कटु संमत तोरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।।
करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।।
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।।
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ।।
गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।।
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू।।
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।।
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानि आपन अनुगामी।।Transliteration
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प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।281।।Transliteration
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देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।।
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा।।
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।।
छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा।।कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।।
राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।
देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें।।
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।Transliteration
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बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।282।।Transliteration
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निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।।
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू। कोप मोर अति घोर कृसानु।।
समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।।
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।।
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।।
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।
राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।।
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं कहि हेतु करौं अभिमाना।।Transliteration
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जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।283।।Transliteration
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देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।।
जौं रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।।
छत्रिय तनु धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।।
कहउँ सुभाउ न कुलहि प्रसंसी। कालहु डरहिं न रन रघुबंसी।।
बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहि डेराई।।
सुनु मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधर मति के।।
राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।।
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।