Skip to main content
राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

Explore illustrated passages (716)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 29 of 39 · Verses 561–580 of 770

दोहा 264

रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन। सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।264।।

चौपाई 262

पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।। सुर किंनर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।। नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।। जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं। बंदी बिरदावलि उच्चरहीं।। महि पाताल नाक जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।। करहिं आरती पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।। सोहति सीय राम कै जौरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।। सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता। करति न चरन परस अति भीता।।

दोहा 265

गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।।265।।

चौपाई 263

तब सिय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।। उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।। लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।। तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई। जीवत हमहि कुअँरि को बरई।। जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।। साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहि लाज लजानी।। बलु प्रतापु बीरता बड़ाई। नाक पिनाकहि संग सिधाई।। सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई।।

दोहा 266

देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु। लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु।।266।।

चौपाई 264

बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नाग अरि भागू।। जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।। लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता कि कामी लहई।। हरि पद बिमुख परम गति चाहा। तस तुम्हार लालचु नरनाहा।। कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखीं लवाइ गईं जहँ रानी।। रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेहु बरनत मन माहीं।। रानिन्ह सहित सोचबस सीया। अब धौं बिधिहि काह करनीया।। भूप बचन सुनि इत उत तकहीं। लखनु राम डर बोलि न सकहीं।।

दोहा 267

अरुन नयन भृकुटी कुटिल चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप।।267।।

चौपाई 265

खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।। तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयसु भृगुकुल कमल पतंगा।। देखि महीप सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।। गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा।। सीस जटा ससिबदनु सुहावा। रिसबस कछुक अरुन होइ आवा।। भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।। बृषभ कंध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला।। कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें। धनु सर कर कुठारु कल काँधें।।

दोहा 268

सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरुप। धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप।।268।।

चौपाई 266

देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।। जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।। जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।। आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गई सयानीं।। बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।। रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।

दोहा 269

बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।269।।

चौपाई 267

समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए।। सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे।। अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू।। अति डरु उतरु देत नृपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर नर नारी।।सोचहिं सकल त्रास उर भारी।। मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।। भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।

दोहा 270

सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।270।।

चौपाई 268

नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।। सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।। बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।।

दोहा 271

रे नृप बालक कालबस बोलत तोहि न सँमार।। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।।271।।

चौपाई 269

लखन कहा हँसि हमरें जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।। का छति लाभु जून धनु तौरें। देखा राम नयन के भोरें।। छुअत टूट रघुपतिहु न दोसू। मुनि बिनु काज करिअ कत रोसू । बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।। बालकु बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानहि मोही।। बाल ब्रह्मचारी अति कोही। बिस्व बिदित छत्रियकुल द्रोही।। भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही।। सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।

दोहा 272

मातु पितहि जनि सोचबस करसि महीसकिसोर। गर्भन्ह के अर्भक दलन परसु मोर अति घोर।।272।।

चौपाई 270

बिहसि लखनु बोले मृदु बानी। अहो मुनीसु महा भटमानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।। इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।। देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।। भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी।। सुर महिसुर हरिजन अरु गाई। हमरें कुल इन्ह पर न सुराई।। बधें पापु अपकीरति हारें। मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें।। कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा।।

दोहा 273

जो बिलोकि अनुचित कहेउँ छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंसमनि बोले गिरा गभीर।।273।।

चौपाई 271

कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।। भानु बंस राकेस कलंकू। निपट निरंकुस अबुध असंकू।। काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।। तुम्ह हटकउ जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बलु रोषु हमारा।। लखन कहेउ मुनि सुजस तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।। अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।। नहिं संतोषु त पुनि कछु कहहू। जनि रिस रोकि दुसह दुख सहहू।। बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देत न पावहु सोभा।।
Continue reading →