Skip to main content
राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

Explore illustrated passages (716)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 28 of 39 · Verses 541–560 of 770

चौपाई 252

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी। बचन नखत अवली न प्रकासी।। मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।। भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा।। गुर पद बंदि सहित अनुरागा। राम मुनिन्ह सन आयसु मागा।। सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।। चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारी।। बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे।। तौ सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं।।

दोहा 255

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ। सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ।।255।।

चौपाई 253

सखि सब कौतुक देखनिहारे। जेठ कहावत हितू हमारे।। कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।। रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।। सो धनु राजकुअँर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं।। भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।। बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजवंत लघु गनिअ न रानी।। कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।। रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु तिभुवन तम भागा।।

दोहा 256

मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब।।256।।

चौपाई 254

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे।। देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजब धनुष रामु सुनु रानी।। सखी बचन सुनि भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।। तब रामहि बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।। मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।। करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।। गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा।। बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।।

दोहा 257

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।। भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर।।257।।

चौपाई 255

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।। अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।। सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़ अनुचित होई।। कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।। बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।। सकल सभा कै मति भै भोरी। अब मोहि संभुचाप गति तोरी।। निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।। अति परिताप सीय मन माही। लव निमेष जुग सब सय जाहीं।।

दोहा 258

प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल।।258।।

चौपाई 256

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।। लोचन जलु रह लोचन कोना। जैसे परम कृपन कर सोना।। सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।। तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पद सरोज चितु राचा।। तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहिं मोहि रघुबर कै दासी।। जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू।। प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान राम सबु जाना।। सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे। चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे।।

दोहा 259

लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु। पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु।।259।।

चौपाई 257

दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।। रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।। चाप सपीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।। सब कर संसउ अरु अग्यानू। मंद महीपन्ह कर अभिमानू।। भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।। सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।। संभुचाप बड बोहितु पाई। चढे जाइ सब संगु बनाई।। राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहि कोउ कड़हारू।।

दोहा 260

राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि।।260।।

चौपाई 258

देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।। का बरषा सब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।। अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।। गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा।। दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ।। लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें।। तेहि छन राम मध्य धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।

छन्द 24

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले।। सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं। कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारही।।

दोहा 261

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु। बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस।।261।।

चौपाई 259

प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।। कोसिकरुप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।। रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।। बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना।। ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा। प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा।। बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किंनर गीत रसाला।। रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुषभंग धुनि जात न जानी।। मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम संभुधनु भारी।।

दोहा 262

बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर। करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर।।262।।

चौपाई 260

झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई।। बाजहिं बहु बाजने सुहाए। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए।। सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।। जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थकें थाह जनु पाई।। श्रीहत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।। सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती। जनु चातकी पाइ जलु स्वाती।। रामहि लखनु बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।। सतानंद तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।

दोहा 263

संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार। गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार।।263।।

चौपाई 261

सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।। कर सरोज जयमाल सुहाई। बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई।। तन सकोचु मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू।। जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।। चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।। सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाई।। सोहत जनु जुग जलज सनाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।। गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।
Continue reading →