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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 27 of 39 · Verses 521–540 of 770

चौपाई 242

प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।। असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं।। बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।। अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई।। बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।। तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा।। एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ।। यह सुनि अवर महिप मुसकाने। धरमसील हरिभगत सयाने।।

सोरठा 245

सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।। जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे।।245।।

चौपाई 243

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।। सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता।। जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी।। सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी।। सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई।। करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।। अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।। देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना।।

दोहा 246

जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाई। चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं।।246।।

चौपाई 244

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी।। उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।। सिय बरनिअ तेइ उपमा देई। कुकबि कहाइ अजसु को लेई।। जौ पटतरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।। गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुखित अतनु पति जानी।। बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमासम किमि बैदेही।। जौ छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छप सोई।। सोभा रजु मंदरु सिंगारू। मथै पानि पंकज निज मारू।।

दोहा 247

एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल। तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल।।247।।

चौपाई 245

चलिं संग लै सखीं सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।। सोह नवल तनु सुंदर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।। भूषन सकल सुदेस सुहाए। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए।। रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।। हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई। बरषि प्रसून अपछरा गाई।। पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।। सीय चकित चित रामहि चाहा। भए मोहबस सब नरनाहा।। मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।

दोहा 248

गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।। लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि।।248।।

चौपाई 246

राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।। सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।। हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।। बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु। सीय राम कर करै बिबाहू।। जग भल कहहि भाव सब काहू। हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू।। एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।। तब बंदीजन जनक बौलाए। बिरिदावली कहत चलि आए।। कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।

दोहा 249

बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल।।249।।

चौपाई 247

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।। रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे।। सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।। त्रिभुवन जय समेत बैदेही।।बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।। सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।। परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।। तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं। उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं।। जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं। चाप समीप महीप न जाहीं।।

दोहा 250

तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ।।250।।

चौपाई 248

भूप सहस दस एकहि बारा। लगे उठावन टरइ न टारा।। डगइ न संभु सरासन कैसें। कामी बचन सती मनु जैसें।। सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसें बिनु बिराग संन्यासी।। कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।। श्रीहत भए हारि हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।। नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।। दीप दीप के भूपति नाना। आए सुनि हम जो पनु ठाना।। देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आए रनधीरा।।

दोहा 251

कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय। पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय।।251।।

चौपाई 249

कहहु काहि यहु लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।। रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई।। अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।। तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू।। सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ।। जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई।। जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भए दुखारी।। माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौंहें।।

दोहा 252

कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान।।252।।

चौपाई 250

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।। कही जनक जसि अनुचित बानी। बिद्यमान रघुकुल मनि जानी।। सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।। जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं। कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं।। काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी।। तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना।। नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ।। कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।।

दोहा 253

तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ। जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ।।253।।

चौपाई 251

लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।। सकल लोक सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।। गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं।। सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे। प्रेम समेत निकट बैठारे।। बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।। उठहु राम भंजहु भवचापा। मेटहु तात जनक परितापा।। सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।। ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ। ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ।।

दोहा 254

उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग। बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग।।254।।
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