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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 26 of 39 · Verses 501–520 of 770

दोहा 235

पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख। महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष।।235।।

चौपाई 233

सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पिआरी।। देबि पूजि पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।। मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबही कें।। कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं। अस कहि चरन गहे बैदेहीं।। बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।। सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा।।

छन्द 23

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो। करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली।।

दोहा 236

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे।।236।।

चौपाई 234

हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुर समीप गवने दोउ भाई।। राम कहा सबु कौसिक पाहीं। सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं।। सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही।। सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।। करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।। बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई। संध्या करन चले दोउ भाई।। प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा।। बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।।

दोहा 237

जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक। सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक।।237।।

चौपाई 235

घटइ बढ़इ बिरहनि दुखदाई। ग्रसइ राहु निज संधिहिं पाई।। कोक सिकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चंद्रमा तोही।। बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे।। सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।। करि मुनि चरन सरोज प्रनामा। आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा।। बिगत निसा रघुनायक जागे। बंधु बिलोकि कहन अस लागे।। उदउ अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।। बोले लखनु जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।

दोहा 238

अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन। जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन।।238।।

चौपाई 236

नृप सब नखत करहिं उजिआरी। टारि न सकहिं चाप तम भारी।। कमल कोक मधुकर खग नाना। हरषे सकल निसा अवसाना।। ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटें धनुष सुखारे।। उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।। रबि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।। तव भुज बल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।। बंधु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।। नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आए। चरन सरोज सुभग सिर नाए।। सतानंदु तब जनक बोलाए। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाए।। जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिए दोउ भाई।।

दोहा 239

सतानंदपद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ।।239।।

चौपाई 237

सीय स्वयंबरु देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई।। लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई।। हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला।। रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।। देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहू सब काहू।।

दोहा 240

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि।।240।।

चौपाई 238

राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा।। राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।। देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।। रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई।।

दोहा 241

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप।।241।।

चौपाई 239

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसैं। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें।। सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा।। हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया।। उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ।।

दोहा 242

राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर। सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर।।242।।

चौपाई 240

सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।। सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के।। चितवत चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहीं बरनी।। कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला।। कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।। भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।। पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।। रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ।।

दोहा 243

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल। बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल।।243।।

चौपाई 241

कटि तूनीर पीत पट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।। पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए।। देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे।। हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई।। करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।। जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।। निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा।। भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ।।

दोहा 244

सब मंचन्ह ते मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।244।।
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