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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 15 of 39 · Verses 281–300 of 770

दोहा 126

सहित सहाय सभीत अति मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब कहि सुठि आरत बैन।।126।।

चौपाई 127

भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय बचन काम परितोषा।। नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।। मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।। सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहि प्रसंसि हरिहि सिरु नावा।। तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।। मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।। बार बार बिनवउँ मुनि तोहीं। जिमि यह कथा सुनायहु मोहीं।। तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएडु तबहूँ।।

दोहा 127

संभु दीन्ह उपदेस हित नहिं नारदहि सोहान। भारद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।127।।

चौपाई 128

राम कीन्ह चाहहिं सोइ होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।। संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।। एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना।। छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।। हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।। बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्हि मुनि दाया।। काम चरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।। अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।

दोहा 128

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान । तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान।।128।।

चौपाई 129

सुनु मुनि मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाके।। ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि कि करइ मनोभव पीरा।। नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।। करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।। बेगि सो मै डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी।। मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मै सोई।। तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदयँ अहमिति अधिकाई।। श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।

दोहा 129

बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।129।।

चौपाई 130

बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनुधारी।। तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा।। सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा।। बिस्वमोहनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।। सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।। करइ स्वयंबर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला।। मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।। सुनि सब चरित भूपगृहँ आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।

दोहा 130

आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुन दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।130।।

चौपाई 131

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगि रहे निहारी।। लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।। जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई।। सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।। लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।। सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।। करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।। जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।

दोहा 131

एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल। जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।131।।

चौपाई 132

हरि सन मागौं सुंदरताई। होइहि जात गहरु अति भाई।। मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोइ होऊ।। बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।। प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहि काजु हिएँ हरषाने।। अति आरति कहि कथा सुनाई। करहु कृपा करि होहु सहाई।। आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।। जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा।। निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।

दोहा 132

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।132।।

चौपाई 133

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।। एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।। माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा।। गवने तुरत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई।। निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।। मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें।। मुनि हित कारन कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।। सो चरित्र लखि काहुँ न पावा। नारद जानि सबहिं सिर नावा।।

दोहा 133

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ। बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।133।।

चौपाई 134

जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।। तहँ बैठ महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ।। करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।। रीझहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी।। मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।। जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।। काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा।। मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।

दोहा 134

सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।134।।

चौपाई 135

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि देहि न बिलोकी भूली।। पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं।। धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।। दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा।। मुनि अति बिकल मोंहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी।। तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।। अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।। बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।

दोहा 135

होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।135।।

चौपाई 136

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।। फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं।। देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई।। बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी।। बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।। सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस न रहा मन बोधा।। पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।। मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु।।
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