Skip to main content
राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

Explore illustrated passages (716)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 16 of 39 · Verses 301–320 of 770

दोहा 136

असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।।136।।

चौपाई 137

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई।। भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू।। डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू।। करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा। अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा।। भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा।। बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोइ तनु धरहु श्राप मम एहा।। कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।। मम अपकार कीन्ही तुम्ह भारी। नारी बिरहँ तुम्ह होब दुखारी।।

दोहा 137

श्राप सीस धरी हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि। निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि।।137।।

चौपाई 138

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।। तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना।। मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला।। मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे।। जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा।। कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें।। जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।। अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई।।

दोहा 138

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान।।138।।

चौपाई 139

हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी।। अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।। हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।। श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।। निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ।। भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ। समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।। चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।।

दोहा 139

एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार। सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार।।139।।

चौपाई 140

एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे।। कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं।। तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।। बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने।। हरि अनंत हरिकथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता।। रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए।। यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी।। प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी।।सेवत सुलभ सकल दुख हारी।।

दोहा 140

सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।। अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि।।140।।

चौपाई 141

अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी।। जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा।। जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा।। जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी।। अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी।। लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा।। भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसकानी।। लगे बहुरि बरने बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू।।

दोहा 141

सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाई।। राम कथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ।।141।।

चौपाई 142

स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा।। दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका।। नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू।। लघु सुत नाम प्रिय्रब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहि जाही।। देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी।। आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला।। सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना।। तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला।।

दोहा 142

होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन। हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु।।142।।

चौपाई 143

बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा।। तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता।। बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा।। पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा।। पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा।। आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी।। जहँ जँह तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए।। कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना ।

दोहा 143

द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग। बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग।।143।।

चौपाई 144

करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा।। पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे।। उर अभिलाष निंरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई।। अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी।। नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा।। संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना।। ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई।। जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा।।

दोहा 144

एहि बिधि बीतें बरष षट सहस बारि आहार। संबत सप्त सहस्त्र पुनि रहे समीर अधार।।144।।

चौपाई 145

बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ।। बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा।। मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए।। अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा।। प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी।। मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी।। मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रबन रंध्र होइ उर जब आई।। ह्रष्टपुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए।।

दोहा 145

श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात। बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात।।145।।

चौपाई 146

सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू।। सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक।। जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू।। जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं।। जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा।। देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन।। दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे।। भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना।।
Continue reading →