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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 14 of 39 · Verses 261–280 of 770

दोहा 116

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।। रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ।।116।।

चौपाई 117

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी।। जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ मानु कहहिं कुबिचारी।। चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ।। उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।। बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता।। सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई।। जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।। जासु सत्यता तें जड माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।

दोहा 117

रजत सीप महुँ मास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।117।।

चौपाई 118

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।। जौं सपनें सिर काटै कोई। बिनु जागें न दूरि दुख होई।। जासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोइ कृपाल रघुराई।। आदि अंत कोउ जासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।। बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी।। तनु बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहइ घ्रान बिनु बास असेषा।। असि सब भाँति अलौकिक करनी। महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।

दोहा 118

जेहि इमि गावहि बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।। सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान।।118।।

चौपाई 119

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।। सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी।। बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं।। सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं।। राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।। अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।। सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।। भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती।।

दोहा 119

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि। बोली गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।119।।

चौपाई 120

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।। तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरुप जानि मोहि परेऊ।। नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा।। अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड नारि अयानी।। प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।। राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।। नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।। उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता।।

सोरठा 120

हिंयँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान बहु बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।120(क)।। सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल। कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड।।120(ख)।। सो संबाद उदार जेहि बिधि भा आगें कहब। सुनहु राम अवतार चरित परम सुंदर अनघ।।120(ग)।। हरि गुन नाम अपार कथा रूप अगनित अमित। मैं निज मति अनुसार कहउँ उमा सादर सुनहु।।120(घ।।

चौपाई 121

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए। बिपुल बिसद निगमागम गाए।। हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कहि जाइ न सोई।। राम अर्तक्य बुद्धि मन बानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।। तदपि संत मुनि बेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।। तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही।। जब जब होइ धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।। करहिं अनीति जाइ नहिं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।। तब तब प्रभु धरि बिबिध सरीरा। हरहि कृपानिधि सज्जन पीरा।।

दोहा 121

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु।।121।।

चौपाई 122

सोइ जस गाइ भगत भव तरहीं। कृपासिंधु जन हित तनु धरहीं।। राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।। जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।। द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु बिजय जान सब कोऊ।। बिप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।। कनककसिपु अरु हाटक लोचन। जगत बिदित सुरपति मद मोचन।। बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।। होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।

दोहा 122

भए निसाचर जाइ तेइ महाबीर बलवान। कुंभकरन रावण सुभट सुर बिजई जग जान।।122 ।

चौपाई 123

मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना।। एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।। कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।। एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित्र पवित्र किए संसारा।। एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलंधर सन सब हारे।। संभु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।। परम सती असुराधिप नारी। तेहि बल ताहि न जितहिं पुरारी।।

दोहा 123

छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।। जब तेहि जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह।।123।।

चौपाई 124

तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना।। तहाँ जलंधर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।। एक जनम कर कारन एहा। जेहि लागि राम धरी नरदेहा।। प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।। नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा।। गिरिजा चकित भई सुनि बानी। नारद बिष्नुभगत पुनि ग्यानि।। कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।। यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह आचरज भारी।।

सोरठा 124

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।124(क)।। कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।124(ख)।।

चौपाई 125

हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरी सुहावनि।। आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।। निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।। सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।। मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।। सहित सहाय जाहु मम हेतू। चकेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।। सुनासीर मन महुँ असि त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।। जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहि डेराहीं।।

दोहा 125

सुख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज। छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज।।125।।

चौपाई 126

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।। कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहि भृंगा।। चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी।। रंभादिक सुरनारि नबीना । सकल असमसर कला प्रबीना।। करहिं गान बहु तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हि पानि पतंगा।। देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।। काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।। सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासु। बड़ रखवार रमापति जासू।।
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