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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 13 of 39 · Verses 241–260 of 770

दोहा 106

जटा मुकुट सुरसरित सिर लोचन नलिन बिसाल। नीलकंठ लावन्यनिधि सोह बालबिधु भाल।।106।।

चौपाई 107

बैठे सोह कामरिपु कैसें। धरें सरीरु सांतरसु जैसें।। पारबती भल अवसरु जानी। गई संभु पहिं मातु भवानी।। जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा। बाम भाग आसनु हर दीन्हा।। बैठीं सिव समीप हरषाई। पूरुब जन्म कथा चित आई।। पति हियँ हेतु अधिक अनुमानी। बिहसि उमा बोलीं प्रिय बानी।। कथा जो सकल लोक हितकारी। सोइ पूछन चह सैलकुमारी।। बिस्वनाथ मम नाथ पुरारी। त्रिभुवन महिमा बिदित तुम्हारी।। चर अरु अचर नाग नर देवा। सकल करहिं पद पंकज सेवा।।

दोहा 107

प्रभु समरथ सर्बग्य सिव सकल कला गुन धाम।। जोग ग्यान बैराग्य निधि प्रनत कलपतरु नाम।।107।।

चौपाई 108

जौं मो पर प्रसन्न सुखरासी। जानिअ सत्य मोहि निज दासी।। तौं प्रभु हरहु मोर अग्याना। कहि रघुनाथ कथा बिधि नाना।। जासु भवनु सुरतरु तर होई। सहि कि दरिद्र जनित दुखु सोई।। ससिभूषन अस हृदयँ बिचारी। हरहु नाथ मम मति भ्रम भारी।। प्रभु जे मुनि परमारथबादी। कहहिं राम कहुँ ब्रह्म अनादी।। सेस सारदा बेद पुराना। सकल करहिं रघुपति गुन गाना।। तुम्ह पुनि राम राम दिन राती। सादर जपहु अनँग आराती।। रामु सो अवध नृपति सुत सोई। की अज अगुन अलखगति कोई।।

दोहा 108

जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि। देख चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि।।108।।

चौपाई 109

जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ।। अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू।। मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई।। तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा।। अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें।। प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा।। तब कर अस बिमोह अब नाहीं। रामकथा पर रुचि मन माहीं।। कहहु पुनीत राम गुन गाथा। भुजगराज भूषन सुरनाथा।।

दोहा 109

बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि। बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि।।109।।

चौपाई 110

जदपि जोषिता नहिं अधिकारी। दासी मन क्रम बचन तुम्हारी।। गूढ़उ तत्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।। अति आरति पूछउँ सुरराया। रघुपति कथा कहहु करि दाया।। प्रथम सो कारन कहहु बिचारी। निर्गुन ब्रह्म सगुन बपु धारी।। पुनि प्रभु कहहु राम अवतारा। बालचरित पुनि कहहु उदारा।। कहहु जथा जानकी बिबाहीं। राज तजा सो दूषन काहीं।। बन बसि कीन्हे चरित अपारा। कहहु नाथ जिमि रावन मारा।। राज बैठि कीन्हीं बहु लीला। सकल कहहु संकर सुखलीला।।

दोहा 110

बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम। प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम।।110।।

चौपाई 111

पुनि प्रभु कहहु सो तत्व बखानी। जेहिं बिग्यान मगन मुनि ग्यानी।। भगति ग्यान बिग्यान बिरागा। पुनि सब बरनहु सहित बिभागा।। औरउ राम रहस्य अनेका। कहहु नाथ अति बिमल बिबेका।। जो प्रभु मैं पूछा नहि होई। सोउ दयाल राखहु जनि गोई।। तुम्ह त्रिभुवन गुर बेद बखाना। आन जीव पाँवर का जाना।। प्रस्न उमा कै सहज सुहाई। छल बिहीन सुनि सिव मन भाई।। हर हियँ रामचरित सब आए। प्रेम पुलक लोचन जल छाए।। श्रीरघुनाथ रूप उर आवा। परमानंद अमित सुख पावा।।

दोहा 111

मगन ध्यानरस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह। रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह।।111।।

चौपाई 112

झूठेउ सत्य जाहि बिनु जानें। जिमि भुजंग बिनु रजु पहिचानें।। जेहि जानें जग जाइ हेराई। जागें जथा सपन भ्रम जाई।। बंदउँ बालरूप सोई रामू। सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू।। मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी।। करि प्रनाम रामहि त्रिपुरारी। हरषि सुधा सम गिरा उचारी।। धन्य धन्य गिरिराजकुमारी। तुम्ह समान नहिं कोउ उपकारी।। पूँछेहु रघुपति कथा प्रसंगा। सकल लोक जग पावनि गंगा।। तुम्ह रघुबीर चरन अनुरागी। कीन्हहु प्रस्न जगत हित लागी।।

दोहा 112

रामकृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं। सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं।।112।।

चौपाई 113

तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई।। जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना।। नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा।। ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला।। जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी।। जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।। कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरिचरित न जो हरषाती।। गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित दनुज बिमोहनसीला।।

दोहा 113

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि। सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि।।113।।

चौपाई 114

रामकथा सुंदर कर तारी। संसय बिहग उडावनिहारी।। रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी।। राम नाम गुन चरित सुहाए। जनम करम अगनित श्रुति गाए।। जथा अनंत राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना।। तदपि जथा श्रुत जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी।। उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसंमत मोहि भाई।। एक बात नहि मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी।। तुम जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।

दोहा 114

कहहि सुनहि अस अधम नर ग्रसे जे मोह पिसाच। पाषंडी हरि पद बिमुख जानहिं झूठ न साच।।114।।

चौपाई 115

अग्य अकोबिद अंध अभागी। काई बिषय मुकर मन लागी।। लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहिं देखी।। कहहिं ते बेद असंमत बानी। जिन्ह कें सूझ लाभु नहिं हानी।। मुकर मलिन अरु नयन बिहीना। राम रूप देखहिं किमि दीना।। जिन्ह कें अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।। हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। तिन्हहि कहत कछु अघटित नाहीं।। बातुल भूत बिबस मतवारे। ते नहिं बोलहिं बचन बिचारे।। जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन् कर कहा करिअ नहिं काना।।

दोहा 115

अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद। सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम।।115।।

चौपाई 116

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।। अगुन अरुप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो होई।। जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जलु हिम उपल बिलग नहिं जैसें।। जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा।। राम सच्चिदानंद दिनेसा। नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा।। सहज प्रकासरुप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना।। हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अहमिति अभिमाना।। राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द परेस पुराना।।
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