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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 12 of 39 · Verses 221–240 of 770

चौपाई 99

तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे।। नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने।। लगे होन पुर मंगलगाना। सजे सबहि हाटक घट नाना।। भाँति अनेक भई जेवराना। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा।। सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी।। सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती।। बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा।। नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी।।

छन्द 13

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं। भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं।। जेवँत जो बढ्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो। अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो।।

दोहा 99

बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ। समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ।।99।।

चौपाई 100

बोलि सकल सुर सादर लीन्हे। सबहि जथोचित आसन दीन्हे।। बेदी बेद बिधान सँवारी। सुभग सुमंगल गावहिं नारी।। सिंघासनु अति दिब्य सुहावा। जाइ न बरनि बिरंचि बनावा।। बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई। हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई।। बहुरि मुनीसन्ह उमा बोलाई। करि सिंगारु सखीं लै आई।। देखत रूपु सकल सुर मोहे। बरनै छबि अस जग कबि को है।। जगदंबिका जानि भव भामा। सुरन्ह मनहिं मन कीन्ह प्रनामा।। सुंदरता मरजाद भवानी। जाइ न कोटिहुँ बदन बखानी।।

छन्द 14

कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा। सकुचहिं कहत श्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा।। छबिखानि मातु भवानि गवनी मध्य मंडप सिव जहाँ।। अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ।।

दोहा 100

मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि। कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि।।100।।

चौपाई 101

जसि बिबाह कै बिधि श्रुति गाई। महामुनिन्ह सो सब करवाई।। गहि गिरीस कुस कन्या पानी। भवहि समरपीं जानि भवानी।। पानिग्रहन जब कीन्ह महेसा। हिंयँ हरषे तब सकल सुरेसा।। बेद मंत्र मुनिबर उच्चरहीं। जय जय जय संकर सुर करहीं।। बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना।। हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू। सकल भुवन भरि रहा उछाहू।। दासीं दास तुरग रथ नागा। धेनु बसन मनि बस्तु बिभागा।। अन्न कनकभाजन भरि जाना। दाइज दीन्ह न जाइ बखाना।।

छन्द 15

दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो। का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो।। सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो। पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो।।

दोहा 101

नाथ उमा मन प्रान सम गृहकिंकरी करेहु। छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु।।101।।

चौपाई 102

बहु बिधि संभु सास समुझाई। गवनी भवन चरन सिरु नाई।। जननीं उमा बोलि तब लीन्ही। लै उछंग सुंदर सिख दीन्ही।। करेहु सदा संकर पद पूजा। नारिधरमु पति देउ न दूजा।। बचन कहत भरे लोचन बारी। बहुरि लाइ उर लीन्हि कुमारी।। कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं। पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं।। भै अति प्रेम बिकल महतारी। धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी।। पुनि पुनि मिलति परति गहि चरना। परम प्रेम कछु जाइ न बरना।। सब नारिन्ह मिलि भेटि भवानी। जाइ जननि उर पुनि लपटानी।।

छन्द 16

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं। फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गई।। जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले। सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले।।

दोहा 102

चले संग हिमवंतु तब पहुँचावन अति हेतु। बिबिध भाँति परितोषु करि बिदा कीन्ह बृषकेतु।।102।।

चौपाई 103

तुरत भवन आए गिरिराई। सकल सैल सर लिए बोलाई।। आदर दान बिनय बहुमाना। सब कर बिदा कीन्ह हिमवाना।। जबहिं संभु कैलासहिं आए। सुर सब निज निज लोक सिधाए।। जगत मातु पितु संभु भवानी। तेही सिंगारु न कहउँ बखानी।। करहिं बिबिध बिधि भोग बिलासा। गनन्ह समेत बसहिं कैलासा।। हर गिरिजा बिहार नित नयऊ। एहि बिधि बिपुल काल चलि गयऊ।। तब जनमेउ षटबदन कुमारा। तारकु असुर समर जेहिं मारा।। आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। षन्मुख जन्मु सकल जग जाना।।

छन्द 17

जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा। तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा।। यह उमा संगु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं। कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं।।

दोहा 103

चरित सिंधु गिरिजा रमन बेद न पावहिं पारु। बरनै तुलसीदासु किमि अति मतिमंद गवाँरु।।103।।

चौपाई 104

संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुख पावा।। बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी।। प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी।। अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा।। सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं।। बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू।। सिव सम को रघुपति ब्रतधारी। बिनु अघ तजी सती असि नारी।। पनु करि रघुपति भगति देखाई। को सिव सम रामहि प्रिय भाई।।

दोहा 104

प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार। सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार।।104।।

चौपाई 105

मैं जाना तुम्हार गुन सीला। कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला।। सुनु मुनि आजु समागम तोरें। कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें।। राम चरित अति अमित मुनिसा। कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा।। तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी। सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी।। सारद दारुनारि सम स्वामी। रामु सूत्रधर अंतरजामी।। जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी।। प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा। बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा।। परम रम्य गिरिबरु कैलासू। सदा जहाँ सिव उमा निवासू।।

दोहा 105

सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद। बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद।।105।।

चौपाई 106

हरि हर बिमुख धर्म रति नाहीं। ते नर तहँ सपनेहुँ नहिं जाहीं।। तेहि गिरि पर बट बिटप बिसाला। नित नूतन सुंदर सब काला।। त्रिबिध समीर सुसीतलि छाया। सिव बिश्राम बिटप श्रुति गाया।। एक बार तेहि तर प्रभु गयऊ। तरु बिलोकि उर अति सुखु भयऊ।। निज कर डासि नागरिपु छाला। बैठै सहजहिं संभु कृपाला।। कुंद इंदु दर गौर सरीरा। भुज प्रलंब परिधन मुनिचीरा।। तरुन अरुन अंबुज सम चरना। नख दुति भगत हृदय तम हरना।। भुजग भूति भूषन त्रिपुरारी। आननु सरद चंद छबि हारी।।
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