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राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

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Passage 19 of 34 · Verses 361–380 of 664

दोहा 176

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि।।176।।

चौपाई 177

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सबही का।। मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा।। गुर पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।। उचित कि अनुचित किएँ बिचारू। धरमु जाइ सिर पातक भारू।। तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई। जो आचरत मोर भल होई।। जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें। तदपि होत परितोषु न जी कें।। अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।। ऊतरु देउँ छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।

दोहा 177

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु।।177।।

चौपाई 178

हित हमार सियपति सेवकाई। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई।। मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपायँ मोर हित नाहीं।। सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।। बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू।। सरुज सरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा।। जायँ जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।। जाउँ राम पहिं आयसु देहू। एकहिं आँक मोर हित एहू।। मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोउ सनेह जड़ता बस कहहू।।

दोहा 178

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज।।178।।

चौपाई 179

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू।। मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।। मोहि समान को पाप निवासू। जेहि लगि सीय राम बनबासू।। रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा। बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा।। मैं सठु सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउँ सचेतू।। बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।। राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।। कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई।।

दोहा 179

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।179।।

चौपाई 180

कैकेई भव तनु अनुरागे। पाँवर प्रान अघाइ अभागे।। जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।। लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।। लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू।। मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।। एहि तें मोर काह अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।। कैकई जठर जनमि जग माहीं। यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं।। मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पाँच कत करहु सहाई।।

दोहा 180

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।180।।

चौपाई 181

कैकइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।। दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई।। तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहँ नीका।। उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।। मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।। मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं।। परम हानि सब कहँ बड़ लाहू। अदिनु मोर नहि दूषन काहू।। संसय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।

दोहा 181

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि। कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि।।181।

चौपाई 182

गुर बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना।। मो कहँ तिलक साज सज सोऊ। भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ।। परिहरि रामु सीय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।। सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी।। डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।। एकइ उर बस दुसह दवारी। मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी।। जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि राम चरन मनु लावा।। मोर जनम रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउँ अभागी।।

दोहा 182

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ।।182।।

चौपाई 183

आन उपाउ मोहि नहि सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।। एकहिं आँक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं।। जद्यपि मैं अनभल अपराधी। भै मोहि कारन सकल उपाधी।। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।। सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।। अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा।। तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी। आयसु आसिष देहु सुबानी।। जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि रामु रजधानी।।

दोहा 183

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस।।183।।

चौपाई 184

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे। राम सनेह सुधाँ जनु पागे।। लोग बियोग बिषम बिष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।। मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल सनेहँ बिकल भए भारी।। भरतहि कहहि सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।। तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।। जो पावँरु अपनी जड़ताई। तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई।। सो सठु कोटिक पुरुष समेता। बसिहि कलप सत नरक निकेता।। अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई। हरइ गरल दुख दारिद दहई।।

दोहा 184

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह।।184।।

चौपाई 185

भा सब कें मन मोदु न थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।। चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रानप्रिय भे सबही के।। मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई। चले सकल घर बिदा कराई।। धन्य भरत जीवनु जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाहीं।। कहहि परसपर भा बड़ काजू। सकल चलै कर साजहिं साजू।। जेहि राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।। कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।

दोहा 185

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ।।185।।

चौपाई 186

घर घर साजहिं बाहन नाना। हरषु हृदयँ परभात पयाना।। भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजि गज भवन भँडारू।। संपति सब रघुपति कै आही। जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही।। तौ परिनाम न मोरि भलाई। पाप सिरोमनि साइँ दोहाई।। करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।। अस बिचारि सुचि सेवक बोले। जे सपनेहुँ निज धरम न डोले।। कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहि लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।
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