Skip to main content
राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

Explore illustrated passages (34)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 20 of 34 · Verses 381–400 of 664

दोहा 186

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।186।।

चौपाई 187

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी। चहत प्रात उर आरत भारी।। जागत सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाए सचिव सुजाना।। कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।। बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग सँवारे।। अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ।। बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।। नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना।। सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी।।

दोहा 187

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।187।।

चौपाई 188

राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।। बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।। देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरि चले हय गय रथ त्यागे।। जाइ समीप राखि निज डोली। राम मातु मृदु बानी बोली।। तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।। तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू। सकल सोक कृस नहिं मग जोगू।। सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।। तमसा प्रथम दिवस करि बासू। दूसर गोमति तीर निवासू।।

दोहा 188

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।188।।

चौपाई 189

सई तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।। समाचार सब सुने निषादा। हृदयँ बिचार करइ सबिषादा।। कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।। जौं पै जियँ न होति कुटिलाई। तौ कत लीन्ह संग कटकाई।। जानहिं सानुज रामहि मारी। करउँ अकंटक राजु सुखारी।। भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।। सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहि समर न जीतनिहारा।। का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।

दोहा 189

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।189।।

चौपाई 190

होहु सँजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊँ। जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ।। समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।। भरत भाइ नृपु मै जन नीचू। बड़ें भाग असि पाइअ मीचू।। स्वामि काज करिहउँ रन रारी। जस धवलिहउँ भुवन दस चारी।। तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें।। साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुँ जासु न रेखा।। जायँ जिअत जग सो महि भारू। जननी जौबन बिटप कुठारू।।

दोहा 190

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।190।।

चौपाई 191

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ। सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ।। भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा। एकहिं एक बढ़ावइ करषा।। चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।। सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं।। अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं। फरसा बाँस सेल सम करहीं।। एक कुसल अति ओड़न खाँड़े। कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े।। निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहि जोहारे जाई।। देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।

दोहा 191

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।191।।

चौपाई 192

राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।। जीवत पाउ न पाछें धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं।। दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू।। एतना कहत छींक भइ बाँए। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।। बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी। भरतहि मिलिअ न होइहि रारी।। रामहि भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं।। सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।

दोहा 192

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ।।192।।

चौपाई 193

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ। बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ।। अस कहि भेंट सँजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।। मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।। मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।। देखि दूरि तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू।। जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा। भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा।। राम सखा सुनि संदनु त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।। गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई। कीन्ह जोहारु माथ महि लाई।।

दोहा 193

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ।।193।।

चौपाई 194

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती। लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती।। धन्य धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।। लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा। जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा।। तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलत पुलक परिपूरित गाता।। राम राम कहि जे जमुहाहीं। तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं।। यह तौ राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जगु पावन कीन्हा।। करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरई।। उलटा नामु जपत जगु जाना। बालमीकि भए ब्रह्म समाना।।

दोहा 194

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात। रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात।।194।।

चौपाई 195

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।। राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं।। रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूँछी कुसल सुमंगल खेमा।। देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।। सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा।। धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।। कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी।। अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें। सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।

दोहा 195

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ।।195।।

चौपाई 196

कपटी कायर कुमति कुजाती। लोक बेद बाहेर सब भाँती।। राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउँ भुवन भूषन तबही तें।। देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानीं। सादर सकल जोहारीं रानीं।। जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।। निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।। कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।। सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।
Continue reading →