Skip to main content
राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

Explore illustrated passages (34)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 18 of 34 · Verses 341–360 of 664

चौपाई 167

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई।। भाँति अनेक भरतु समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।। भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं।। छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी।। जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें।। जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें।। जे पातक उपपातक अहहीं। करम बचन मन भव कबि कहहीं।। ते पातक मोहि होहुँ बिधाता। जौं यहु होइ मोर मत माता।।

दोहा 167

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर।।167।।

चौपाई 168

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहीं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।। लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा।। पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा।। जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई।। तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ।।

दोहा 168

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ।।168।।

चौपाई 169

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे।। बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।। भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू।। मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं।। अस कहि मातु भरतु हियँ लाए। थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए।। करत बिलाप बहुत यहि भाँती। बैठेहिं बीति गइ सब राती।। बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।

दोहा 169

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।169।।

चौपाई 170

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमानु बनावा।। गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानि दरसन अभिलाषी।। चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।। सरजु तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।। एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।। सोधि सुमृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।। जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा। तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा।। भए बिसुद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजि गज बाहन नाना।।

दोहा 170

सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम। दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम।।170।।

चौपाई 171

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।। सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। बैठे राजसभाँ सब जाई। पठए बोलि भरत दोउ भाई।। भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे। नीति धरममय बचन उचारे।। प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी। कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी।। भूप धरमब्रतु सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा।। कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।। बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी।।

दोहा 171

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ।।171।।

चौपाई 172

अस बिचारि केहि देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू।। तात बिचारु केहि करहु मन माहीं। सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं।। सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना। तजि निज धरमु बिषय लयलीना।। सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना।। सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।। सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।। सोचिअ पुनि पति बंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।। सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुसरई।।

दोहा 172

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग।।172।।

चौपाई 173

बैखानस सोइ सोचै जोगु। तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू।। सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननि जनक गुर बंधु बिरोधी।। सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।। सोचनीय सबहि बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।। सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। भयउ न अहइ न अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।। बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा।।

दोहा 173

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।173।।

चौपाई 174

सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।। यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।। राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा। पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा।। तजे रामु जेहिं बचनहि लागी। तनु परिहरेउ राम बिरहागी।। नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।। करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई।। परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजातिहि जौबनु दयऊ। पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ।।

दोहा 174

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।।174।।

चौपाई 175

अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।। सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू।। बेद बिदित संमत सबही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।। करहु राजु परिहरहु गलानी। मानहु मोर बचन हित जानी।। सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं। अनुचित कहब न पंडित केहीं।। कौसल्यादि सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।। परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि।। सौंपेहु राजु राम कै आएँ। सेवा करेहु सनेह सुहाएँ।।

दोहा 175

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि।।175।।

चौपाई 176

कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।। सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।। बन रघुपति सुरपति नरनाहू। तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू।। परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा।। लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।। सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।। गुर के बचन सचिव अभिनंदनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।। सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी।।

छन्द 7

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए।। सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की।।
Continue reading →