चलहु बेगि सुनि गुर बचन भलेहिं नाथ सिरु नाइ।
भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।294।।1
बालकाण्ड
Bala Kanda
The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.
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Passage 32 of 39 · Verses 621–640 of 770
राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।।
सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।।
प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बनी।।
मुदित असीस देहिं गुरु नारीं। अति आनंद मगन महतारीं।।
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती।।
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी।।
मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।।
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।Transliteration
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जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।295।।Transliteration
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कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।।
समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होने बधाए।।
भुवन चारि दस भरा उछाहू। जनकसुता रघुबीर बिआहू।।
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे।।
जद्यपि अवध सदैव सुहावनि। राम पुरी मंगलमय पावनि।।
तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।।
ध्वज पताक पट चामर चारु। छावा परम बिचित्र बजारू।।
कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूब दधि अच्छत माला।।Transliteration
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मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।
बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ।।296।।Transliteration
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जहँ तहँ जूथ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।।
बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरुप रति मानु बिमोचनि।।
गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनिकल रव कलकंठि लजानीं।।
भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना।।
मंगल द्रब्य मनोहर नाना। राजत बाजत बिपुल निसाना।।
कतहुँ बिरिद बंदी उच्चरहीं। कतहुँ बेद धुनि भूसुर करहीं।।
गावहिं सुंदरि मंगल गीता। लै लै नामु रामु अरु सीता।।
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा। मानहुँ उमगि चला चहु ओरा।।Transliteration
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सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार।
जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार।।297।।Transliteration
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भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।।
चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।।
भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।।
रचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे।।
सुभग सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।।
नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उड़ाने।।
तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा।।
सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।Transliteration
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छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।
जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन।।298।।Transliteration
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बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े। निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े।।
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना।।
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।।
चवँर चारु किंकिन धुनि करही। भानु जान सोभा अपहरहीं।।
सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते।।
सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।।
जे जल चलहिं थलहि की नाई। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।।
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई।।Transliteration
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चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।
होत सगुन सुन्दर सबहि जो जेहि कारज जात।।299।।Transliteration
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कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं।।
चले मत्तगज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।
बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुभग सुखासन जाना।।
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा। जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा।।
मागध सूत बंदि गुनगायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।।
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।।
चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साजु समाजु बनाई।।Transliteration
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सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर।।300।।Transliteration
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गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।।
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।
महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिंएँ आरती मंगल थारी।।
गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।।
तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।।
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।Transliteration
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तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।301।।Transliteration
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सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।।
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहि सब भाँति बनाऊ।।
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।।
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।
भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे।।
सुर नर नारि सुमंगल गाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।।
करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना ।Transliteration
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तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान।।
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।302।।Transliteration
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बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुभदाता।।
चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।
दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहूँ पावा।।
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सवाल आव बर नारी।।
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।।
मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।
छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी।।
सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।Transliteration
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मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।303।।Transliteration
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मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें।।
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता।।
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।।
एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना।।
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू।।
बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।।
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए।।
नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।