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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 3 of 39 · Verses 41–60 of 770

सोरठा 14

सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान। सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान।।14(क)।। सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर। करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर।।14(ख)।। कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल। बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल।।14(ग)।। बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ। सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित।।14(घ)।। बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस। जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु।।14(ङ)।। बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ। संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी।।14(च)।। बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि। होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि।।14(छ)।।

चौपाई 15

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता।। मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका।। गुर पितु मातु महेस भवानी। प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी।। सेवक स्वामि सखा सिय पी के। हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके।। कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा।। अनमिल आखर अरथ न जापू। प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू।। सो उमेस मोहि पर अनुकूला। करिहिं कथा मुद मंगल मूला।। सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ। बरनउँ रामचरित चित चाऊ।। भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती। ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती।। जे एहि कथहि सनेह समेता। कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता।। होइहहिं राम चरन अनुरागी। कलि मल रहित सुमंगल भागी।।

दोहा 15

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ। तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ।।15।।

चौपाई 16

बंदउँ अवध पुरी अति पावनि। सरजू सरि कलि कलुष नसावनि।। प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी। ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी।। सिय निंदक अघ ओघ नसाए। लोक बिसोक बनाइ बसाए।। बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची।। प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू। बिस्व सुखद खल कमल तुसारू।। दसरथ राउ सहित सब रानी। सुकृत सुमंगल मूरति मानी।। करउँ प्रनाम करम मन बानी। करहु कृपा सुत सेवक जानी।। जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता। महिमा अवधि राम पितु माता।।

दोहा 16

बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद। बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।।16।।

चौपाई 17

प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू। जाहि राम पद गूढ़ सनेहू।। जोग भोग महँ राखेउ गोई। राम बिलोकत प्रगटेउ सोई।। प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना। जासु नेम ब्रत जाइ न बरना।। राम चरन पंकज मन जासू। लुबुध मधुप इव तजइ न पासू।। बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुख दाता।। रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका।। सेष सहस्त्रसीस जग कारन। जो अवतरेउ भूमि भय टारन।। सदा सो सानुकूल रह मो पर। कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर।। रिपुसूदन पद कमल नमामी। सूर सुसील भरत अनुगामी।। महावीर बिनवउँ हनुमाना। राम जासु जस आप बखाना।।

दोहा 17

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन। जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर।।17।।

चौपाई 18

कपिपति रीछ निसाचर राजा। अंगदादि जे कीस समाजा।। बंदउँ सब के चरन सुहाए। अधम सरीर राम जिन्ह पाए।। रघुपति चरन उपासक जेते। खग मृग सुर नर असुर समेते।। बंदउँ पद सरोज सब केरे। जे बिनु काम राम के चेरे।। सुक सनकादि भगत मुनि नारद। जे मुनिबर बिग्यान बिसारद।। प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा। करहु कृपा जन जानि मुनीसा।। जनकसुता जग जननि जानकी। अतिसय प्रिय करुना निधान की।। ताके जुग पद कमल मनावउँ। जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ।। पुनि मन बचन कर्म रघुनायक। चरन कमल बंदउँ सब लायक।। राजिवनयन धरें धनु सायक। भगत बिपति भंजन सुख दायक।।

दोहा 18

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न। बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न।।18।।

चौपाई 19

बंदउँ नाम राम रघुवर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को।। बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो।। महामंत्र जोइ जपत महेसू। कासीं मुकुति हेतु उपदेसू।। महिमा जासु जान गनराउ। प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।। जान आदिकबि नाम प्रतापू। भयउ सुद्ध करि उलटा जापू।। सहस नाम सम सुनि सिव बानी। जपि जेई पिय संग भवानी।। हरषे हेतु हेरि हर ही को। किय भूषन तिय भूषन ती को।। नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।

दोहा 19

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।। राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास।।19।।

चौपाई 20

आखर मधुर मनोहर दोऊ। बरन बिलोचन जन जिय जोऊ।। सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू। लोक लाहु परलोक निबाहू।। कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके। राम लखन सम प्रिय तुलसी के।। बरनत बरन प्रीति बिलगाती। ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती।। नर नारायन सरिस सुभ्राता। जग पालक बिसेषि जन त्राता।। भगति सुतिय कल करन बिभूषन। जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन । स्वाद तोष सम सुगति सुधा के। कमठ सेष सम धर बसुधा के।। जन मन मंजु कंज मधुकर से। जीह जसोमति हरि हलधर से।।

दोहा 20

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ। तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ।।20।।

चौपाई 21

समुझत सरिस नाम अरु नामी। प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी।। नाम रूप दुइ ईस उपाधी। अकथ अनादि सुसामुझि साधी।। को बड़ छोट कहत अपराधू। सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू।। देखिअहिं रूप नाम आधीना। रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना।। रूप बिसेष नाम बिनु जानें। करतल गत न परहिं पहिचानें।। सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें। आवत हृदयँ सनेह बिसेषें।। नाम रूप गति अकथ कहानी। समुझत सुखद न परति बखानी।। अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी। उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।।

दोहा 21

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर।।21।।

चौपाई 22

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी। बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी।। ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा। अकथ अनामय नाम न रूपा।। जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ। नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ।। साधक नाम जपहिं लय लाएँ। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ।। जपहिं नामु जन आरत भारी। मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी।। राम भगत जग चारि प्रकारा। सुकृती चारिउ अनघ उदारा।। चहू चतुर कहुँ नाम अधारा। ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।। चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ। कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ।।

दोहा 22

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन। नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन।।22।।

चौपाई 23

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा।। मोरें मत बड़ नामु दुहू तें। किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें।। प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की। कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की।। एकु दारुगत देखिअ एकू। पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू।। उभय अगम जुग सुगम नाम तें। कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें।। ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी। सत चेतन धन आनँद रासी।। अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी। सकल जीव जग दीन दुखारी।। नाम निरूपन नाम जतन तें। सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें।।

दोहा 23

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार। कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार।।23।।

चौपाई 24

राम भगत हित नर तनु धारी। सहि संकट किए साधु सुखारी।। नामु सप्रेम जपत अनयासा। भगत होहिं मुद मंगल बासा।। राम एक तापस तिय तारी। नाम कोटि खल कुमति सुधारी।। रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी।। सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा।। भंजेउ राम आपु भव चापू। भव भय भंजन नाम प्रतापू।। दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन। जन मन अमित नाम किए पावन।।। निसिचर निकर दले रघुनंदन। नामु सकल कलि कलुष निकंदन।।
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