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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 2 of 39 · Verses 21–40 of 770

चौपाई 5

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा।। बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा।। बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।। बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं।। उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं।। सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू।। भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती।। सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू।। गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई।।

दोहा 5ख

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।।5।।

चौपाई 6

खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा।। तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने।। भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए।। कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना।। दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती।। दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू।। माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा।। कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा।। सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा।।

दोहा 6

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार। संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार।।6।।

चौपाई 7

अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता।। काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई।। सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं।। खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू।। लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ।। उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।। किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू।। हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू।। गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा।। साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी।। धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई।। सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता।।

सोरठा 7

ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग। होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।।7(क)।। सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह। ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह।।7(ख)।। जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि। बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।।7(ग)।। देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब। बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब।।7(घ)।।

चौपाई 8

आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी।। सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।। जानि कृपाकर किंकर मोहू। सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू।। निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं। तातें बिनय करउँ सब पाही।। करन चहउँ रघुपति गुन गाहा। लघु मति मोरि चरित अवगाहा।। सूझ न एकउ अंग उपाऊ। मन मति रंक मनोरथ राऊ।। मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी। चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी।। छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई। सुनिहहिं बालबचन मन लाई।। जौ बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता।। हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी। जे पर दूषन भूषनधारी।। निज कवित केहि लाग न नीका। सरस होउ अथवा अति फीका।। जे पर भनिति सुनत हरषाही। ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं।। जग बहु नर सर सरि सम भाई। जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई।। सज्जन सकृत सिंधु सम कोई। देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई।।

दोहा 8

भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास। पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास।।8।।

चौपाई 9

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा।। हंसहि बक दादुर चातकही। हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही।। कबित रसिक न राम पद नेहू। तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू।। भाषा भनिति भोरि मति मोरी। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी।। प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी। तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी।। हरि हर पद रति मति न कुतरकी। तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की।। राम भगति भूषित जियँ जानी। सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी।। कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू। सकल कला सब बिद्या हीनू।। आखर अरथ अलंकृति नाना। छंद प्रबंध अनेक बिधाना।। भाव भेद रस भेद अपारा। कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा।। कबित बिबेक एक नहिं मोरें। सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे।।

दोहा 9

भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक। सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक।।9।।

चौपाई 10

एहि महँ रघुपति नाम उदारा। अति पावन पुरान श्रुति सारा।। मंगल भवन अमंगल हारी। उमा सहित जेहि जपत पुरारी।। भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ। राम नाम बिनु सोह न सोऊ।। बिधुबदनी सब भाँति सँवारी। सोन न बसन बिना बर नारी।। सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी।। सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही। मधुकर सरिस संत गुनग्राही।। जदपि कबित रस एकउ नाही। राम प्रताप प्रकट एहि माहीं।। सोइ भरोस मोरें मन आवा। केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा।। धूमउ तजइ सहज करुआई। अगरु प्रसंग सुगंध बसाई।। भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी। राम कथा जग मंगल करनी।।

छन्द 1

मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।। गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की।। प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।। भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी।।

सोरठा 10

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग। दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग।।10(क)।। स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान। गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान।।10(ख)।।

चौपाई 11

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी। अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी।। नृप किरीट तरुनी तनु पाई। लहहिं सकल सोभा अधिकाई।। तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं। उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं।। भगति हेतु बिधि भवन बिहाई। सुमिरत सारद आवति धाई।। राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ। सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ।। कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी। गावहिं हरि जस कलि मल हारी।। कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना। सिर धुनि गिरा लगत पछिताना।। हृदय सिंधु मति सीप समाना। स्वाति सारदा कहहिं सुजाना।। जौं बरषइ बर बारि बिचारू। होहिं कबित मुकुतामनि चारू।।

दोहा 11

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग। पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।11।।

चौपाई 12

जे जनमे कलिकाल कराला। करतब बायस बेष मराला।। चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े। कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें।। बंचक भगत कहाइ राम के। किंकर कंचन कोह काम के।। तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। धींग धरमध्वज धंधक धोरी।। जौं अपने अवगुन सब कहऊँ। बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ।। ताते मैं अति अलप बखाने। थोरे महुँ जानिहहिं सयाने।। समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी। कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी।। एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका।। कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ। मति अनुरूप राम गुन गावउँ।। कहँ रघुपति के चरित अपारा। कहँ मति मोरि निरत संसारा।। जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं। कहहु तूल केहि लेखे माहीं।। समुझत अमित राम प्रभुताई। करत कथा मन अति कदराई।।

दोहा 12

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान। नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान।।12।।

चौपाई 13

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई। तदपि कहें बिनु रहा न कोई।। तहाँ बेद अस कारन राखा। भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा।। एक अनीह अरूप अनामा। अज सच्चिदानंद पर धामा।। ब्यापक बिस्वरूप भगवाना। तेहिं धरि देह चरित कृत नाना।। सो केवल भगतन हित लागी। परम कृपाल प्रनत अनुरागी।। जेहि जन पर ममता अति छोहू। जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू।। गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।। बुध बरनहिं हरि जस अस जानी। करहि पुनीत सुफल निज बानी।। तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा। कहिहउँ नाइ राम पद माथा।। मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई। तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई।।

दोहा 13

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं। चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं।।13।।

चौपाई 14

एहि प्रकार बल मनहि देखाई। करिहउँ रघुपति कथा सुहाई।। ब्यास आदि कबि पुंगव नाना। जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना।। चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे। पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे।। कलि के कबिन्ह करउँ परनामा। जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा।। जे प्राकृत कबि परम सयाने। भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने।। भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें। प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें।। होहु प्रसन्न देहु बरदानू। साधु समाज भनिति सनमानू।। जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं। सो श्रम बादि बाल कबि करहीं।। कीरति भनिति भूति भलि सोई। सुरसरि सम सब कहँ हित होई।। राम सुकीरति भनिति भदेसा। असमंजस अस मोहि अँदेसा।। तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे। सिअनि सुहावनि टाट पटोरे।।
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