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राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

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Passage 27 of 34 · Verses 521–540 of 664

चौपाई 255

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।। केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।। सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।। उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।। भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।। जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।। दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।। सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

दोहा 255

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।

चौपाई 256

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।। सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।। तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।। सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।। मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।। बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।। कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।। कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।

दोहा 256

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।

चौपाई 257

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।। भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।। गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।। औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।। भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।। बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।। सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।

दोहा 257

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।

चौपाई 258

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।। सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।। सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।। प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।। पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।। कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।। तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।। मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।

दोहा 258

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।

चौपाई 259

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।। भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।। बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।। नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।। जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।। राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।। लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।। भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।

दोहा 259

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात। कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।

चौपाई 260

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू।। पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें। नीरज नयन नेह जल बाढ़ें।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा। मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेह बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूँ देखी।। सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू। कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू।। मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही। हारेहुँ खेल जितावहिं मोही।।

दोहा 260

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन। दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन।।260।।

चौपाई 261

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा। यहउ कहत मोहि आजु न सोभा। अपनीं समुझि साधु सुचि को भा।। मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।। सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू। मोर अभाग उदधि अवगाहू।। बिनु समुझें निज अघ परिपाकू। जारिउँ जायँ जननि कहि काकू।। हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा। एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।

दोहा 261

साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ। प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।261।।

चौपाई 262

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगतु सबु साखी।। देखि न जाहि बिकल महतारी। जरहिं दुसह जर पुर नर नारी।। महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेष लखन सिय साथा।। बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ। संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ।। बहुरि निहार निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।। अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।

दोहा 262

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि। तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि।।262।।

चौपाई 263

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरति प्रीति बिनय नय सानी।। सोक मगन सब सभाँ खभारू। मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू।। कहि अनेक बिधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।। तात जाँय जियँ करहु गलानी। ईस अधीन जीव गति जानी।। तीनि काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरे।। उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई। जाइ लोकु परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई।।

दोहा 263

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।263।।

चौपाई 264

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतरक करहु जनि जाएँ। बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ।। मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।। तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें। करौं काह असमंजस जीकें।। राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।। तासु बचन मेटत मन सोचू। तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा।।

दोहा 264

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।264।।
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