Skip to main content
राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

Explore illustrated passages (34)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 26 of 34 · Verses 501–520 of 664

दोहा 245

महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।। पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।

चौपाई 246

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।। गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।। बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।। सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।। परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।। तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।। जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।। मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।

दोहा 246

लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।। हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।

चौपाई 247

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।। कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।। नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।। मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।। कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।। सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।। मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।। ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।

दोहा 247

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।

चौपाई 248

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।। जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।। सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।। सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।। नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।। सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।। सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।। बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।

दोहा 248

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।

चौपाई 249

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।। सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।। पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।। मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।। राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।। झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।। बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।। सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।

दोहा 249

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।

चौपाई 250

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।। भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।। सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।। देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।। कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।। हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।। राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।

दोहा 250

यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।

चौपाई 251

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।। देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।। यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।। हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।। पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।। सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।। जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।। बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।

छन्द 10

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।। नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।

दोहा 251

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम।।251।।

चौपाई 252

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।। सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।। लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।। सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।। लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।। अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।। लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।। यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।

दोहा 252

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।

चौपाई 253

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।। केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।। अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।। मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।। मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।। जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।। एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।। प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।

दोहा 253

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।

चौपाई 254

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।। धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।। सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।। गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।। नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।। बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।। अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।। करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।

दोहा 254

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ। समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।
Continue reading →