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राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

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Passage 12 of 34 · Verses 221–240 of 664

चौपाई 108

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।। तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा।। सो बड सो सब गुन गन गेहू। जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू।। मुनि रघुबीर परसपर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।। यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।। राम प्रनाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए लहि लोयन लाहू।। देहिं असीस परम सुखु पाई। फिरे सराहत सुंदरताई।।

दोहा 108ख

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ।।108।।

चौपाई 109

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।। मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं।। साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।। सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहि मगु दीख हमारा।। मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे।। करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई।। ग्राम निकट जब निकसहि जाई। देखहि दरसु नारि नर धाई।। होहि सनाथ जनम फलु पाई। फिरहि दुखित मनु संग पठाई।।

दोहा 109

बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।109।।

चौपाई 110

सुनत तीरवासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।। लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई।। अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं।। जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।। सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।। सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं।। तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेजपुंज लघुबयस सुहावा।। कवि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।

दोहा 110

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि।।110।।

चौपाई 111

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।। मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरे तन कह सबु कोऊ।। बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा। लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा।। पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा।। कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा।। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।। राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी।।

दोहा 111

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेंइँ कीन्ह।।111।।

चौपाई 112

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी।। चले ससीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कइ करत बड़ाई।। पथिक अनेक मिलहिं मग जाता। कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता।। राज लखन सब अंग तुम्हारें। देखि सोचु अति हृदय हमारें।। मारग चलहु पयादेहि पाएँ। ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ।। अगमु पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी।। करि केहरि बन जाइ न जोई। हम सँग चलहि जो आयसु होई।। जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई। फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई।।

दोहा 112

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन। कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन।।112।।

चौपाई 113

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।। जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावति नाहीं।। पुन्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी।। जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि। सीता लखन सहित घनस्यामहि।। जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं।। जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कलपतरु तासु बड़ाई।। परसि राम पद पदुम परागा। मानति भूमि भूरि निज भागा।।

दोहा 113

छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं।।113।।

चौपाई 114

सीता लखन सहित रघुराई। गाँव निकट जब निकसहिं जाई।। सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी। चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी।। राम लखन सिय रूप निहारी। पाइ नयनफलु होहिं सुखारी।। सजल बिलोचन पुलक सरीरा। सब भए मगन देखि दोउ बीरा।। बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी।। एकन्ह एक बोलि सिख देहीं। लोचन लाहु लेहु छन एहीं।। रामहि देखि एक अनुरागे। चितवत चले जाहिं सँग लागे।। एक नयन मग छबि उर आनी। होहिं सिथिल तन मन बर बानी।।

दोहा 114

एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात।।114।।

चौपाई 115

एक कलस भरि आनहिं पानी। अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।। सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।। जानी श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।। मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।। एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।। तरुन तमाल बरन तनु सोहा। देखत कोटि मदन मनु मोहा।। दामिनि बरन लखन सुठि नीके। नख सिख सुभग भावते जी के।। मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा। सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा।।

दोहा 115

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल।।115।।

चौपाई 116

बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।। राम लखन सिय सुंदरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।। थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से।। सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं।। बार बार सब लागहिं पाएँ। कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ।। राजकुमारि बिनय हम करहीं। तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं। स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवाँरी।। राजकुअँर दोउ सहज सलोने। इन्ह तें लही दुति मरकत सोने।।

दोहा 116

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।116।।

चौपाई 117

कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।। सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी।। तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी। दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी।। सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।। सहज सुभाय सुभग तन गोरे। नामु लखनु लघु देवर मोरे।। बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी। पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी।। खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि।। भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।

दोहा 117

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।117।।
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