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राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

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Passage 11 of 34 · Verses 201–220 of 664

दोहा 98

सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ।। मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ।।98।।

चौपाई 99

प्राननाथ प्रिय देवर साथा। बीर धुरीन धरें धनु भाथा।। नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें।। सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी। भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी।। नयन सूझ नहिं सुनइ न काना। कहि न सकइ कछु अति अकुलाना।। राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति। तदपि होति नहिं सीतलि छाती।। जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।। मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन करम गति कछु न बसाई।। राम लखन सिय पद सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई।।

दोहा 99

-रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।99।।

चौपाई 100

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें।। बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए।। मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।। चरन कमल रज कहुँ सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।। छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई।। एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू।। जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।

छन्द 4

पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं।। बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं।।

दोहा 100

सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।100।।

चौपाई 101

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई।। वेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू।। जासु नाम सुमरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।। सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा।। पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी।। केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।। अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा।। बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं।।

दोहा 101

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार। पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।101।।

चौपाई 102

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता। सीयराम गुह लखन समेता।। केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा।। पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी।। कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।। नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।। बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी।। अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।। फिरती बार मोहि जे देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।

दोहा 102

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।102।।

चौपाई 103

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा।। सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।। पति देवर संग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी।। सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।। सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।। लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें।। तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई।। तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होपन हित निज बागीसा।।

दोहा 103

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ। पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।103।।

चौपाई 104

गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकुला।। तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुखु भा उर दाहू।। दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।। नाथ साथ रहि पंथु देखाई। करि दिन चारि चरन सेवकाई।। जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करबि सुहाई।। तब मोहि कहँ जसि देब रजाई। सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई।। सहज सनेह राम लखि तासु। संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू।। पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।

दोहा 104

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ। सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ।।104।।

चौपाई 105

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू।। प्रात प्रातकृत करि रधुसाई। तीरथराजु दीख प्रभु जाई।। सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।। चारि पदारथ भरा भँडारु। पुन्य प्रदेस देस अति चारु।। छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा। सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।। सेन सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।। संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।। चवँर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।

दोहा 105

सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम। बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम।।105।।

चौपाई 106

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुखु पावा।। कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।। करि प्रनामु देखत बन बागा। कहत महातम अति अनुरागा।। एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।। मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा। पुजि जथाबिधि तीरथ देवा।। तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।। मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ। ब्रह्मानंद रासि जनु पाई।।

दोहा 106

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि।।106।।

चौपाई 107

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।। कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के।। सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाए।। भए बिगतश्रम रामु सुखारे। भरव्दाज मृदु बचन उचारे।। आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।। सफल सकल सुभ साधन साजू। राम तुम्हहि अवलोकत आजू।। लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हारें दरस आस सब पूजी।। अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।

दोहा 108क

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार।।
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