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राम

3

अरण्यकाण्ड

Aranya Kanda

Life in the forest: encounters with sages, Surpanakha, the golden deer, Sita's abduction by Ravana.

98 verses

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Passage 5 of 5 · Verses 81–98 of 98

चौपाई 35

चले राम त्यागा बन सोऊ। अतुलित बल नर केहरि दोऊ।। बिरही इव प्रभु करत बिषादा। कहत कथा अनेक संबादा।। लछिमन देखु बिपिन कइ सोभा। देखत केहि कर मन नहिं छोभा।। नारि सहित सब खग मृग बृंदा। मानहुँ मोरि करत हहिं निंदा।। हमहि देखि मृग निकर पराहीं। मृगीं कहहिं तुम्ह कहँ भय नाहीं।। तुम्ह आनंद करहु मृग जाए। कंचन मृग खोजन ए आए।। संग लाइ करिनीं करि लेहीं। मानहुँ मोहि सिखावनु देहीं।। सास्त्र सुचिंतित पुनि पुनि देखिअ। भूप सुसेवित बस नहिं लेखिअ।। राखिअ नारि जदपि उर माहीं। जुबती सास्त्र नृपति बस नाहीं।। देखहु तात बसंत सुहावा। प्रिया हीन मोहि भय उपजावा।।

दोहा 38

बिरह बिकल बलहीन मोहि जानेसि निपट अकेल। सहित बिपिन मधुकर खग मदन कीन्ह बगमेल।।37(क)।। देखि गयउ भ्राता सहित तासु दूत सुनि बात। डेरा कीन्हेउ मनहुँ तब कटकु हटकि मनजात।।37(ख)।।

चौपाई 36

बिटप बिसाल लता अरुझानी। बिबिध बितान दिए जनु तानी।। कदलि ताल बर धुजा पताका। दैखि न मोह धीर मन जाका।। बिबिध भाँति फूले तरु नाना। जनु बानैत बने बहु बाना।। कहुँ कहुँ सुन्दर बिटप सुहाए। जनु भट बिलग बिलग होइ छाए।। कूजत पिक मानहुँ गज माते। ढेक महोख ऊँट बिसराते।। मोर चकोर कीर बर बाजी। पारावत मराल सब ताजी।। तीतिर लावक पदचर जूथा। बरनि न जाइ मनोज बरुथा।। रथ गिरि सिला दुंदुभी झरना। चातक बंदी गुन गन बरना।। मधुकर मुखर भेरि सहनाई। त्रिबिध बयारि बसीठीं आई।। चतुरंगिनी सेन सँग लीन्हें। बिचरत सबहि चुनौती दीन्हें।। लछिमन देखत काम अनीका। रहहिं धीर तिन्ह कै जग लीका।। एहि कें एक परम बल नारी। तेहि तें उबर सुभट सोइ भारी।।

दोहा 39

तात तीनि अति प्रबल खल काम क्रोध अरु लोभ। मुनि बिग्यान धाम मन करहिं निमिष महुँ छोभ।।38(क)।। लोभ कें इच्छा दंभ बल काम कें केवल नारि। क्रोध के परुष बचन बल मुनिबर कहहिं बिचारि।।38(ख)।।

चौपाई 37

गुनातीत सचराचर स्वामी। राम उमा सब अंतरजामी।। कामिन्ह कै दीनता देखाई। धीरन्ह कें मन बिरति दृढ़ाई।। क्रोध मनोज लोभ मद माया। छूटहिं सकल राम कीं दाया।। सो नर इंद्रजाल नहिं भूला। जा पर होइ सो नट अनुकूला।। उमा कहउँ मैं अनुभव अपना। सत हरि भजनु जगत सब सपना।। पुनि प्रभु गए सरोबर तीरा। पंपा नाम सुभग गंभीरा।। संत हृदय जस निर्मल बारी। बाँधे घाट मनोहर चारी।। जहँ तहँ पिअहिं बिबिध मृग नीरा। जनु उदार गृह जाचक भीरा।।

दोहा 40क

पुरइनि सबन ओट जल बेगि न पाइअ मर्म। मायाछन्न न देखिऐ जैसे निर्गुन ब्रह्म।।39(क)।। सुखि मीन सब एकरस अति अगाध जल माहिं। जथा धर्मसीलन्ह के दिन सुख संजुत जाहिं।।39(ख)।।

चौपाई 38

बिकसे सरसिज नाना रंगा। मधुर मुखर गुंजत बहु भृंगा।। बोलत जलकुक्कुट कलहंसा। प्रभु बिलोकि जनु करत प्रसंसा।। चक्रवाक बक खग समुदाई। देखत बनइ बरनि नहिं जाई।। सुन्दर खग गन गिरा सुहाई। जात पथिक जनु लेत बोलाई।। ताल समीप मुनिन्ह गृह छाए। चहु दिसि कानन बिटप सुहाए।। चंपक बकुल कदंब तमाला। पाटल पनस परास रसाला।। नव पल्लव कुसुमित तरु नाना। चंचरीक पटली कर गाना।। सीतल मंद सुगंध सुभाऊ। संतत बहइ मनोहर बाऊ।। कुहू कुहू कोकिल धुनि करहीं। सुनि रव सरस ध्यान मुनि टरहीं।।

दोहा 40ख

फल भारन नमि बिटप सब रहे भूमि निअराइ। पर उपकारी पुरुष जिमि नवहिं सुसंपति पाइ।।40।।

चौपाई 39

देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा।। देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया।। तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए।। बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला।। बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी।। मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा।। ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई।। यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना।। गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी।। करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई।। स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे।।

दोहा 41

नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि। नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि।।41।।

चौपाई 40

सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक।। देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी।। जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ।। कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी।। जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें।। तब नारद बोले हरषाई । अस बर मागउँ करउँ ढिठाई।। जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका।। राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका।।

दोहा 43क

राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम। अपर नाम उडगन बिमल बसुहुँ भगत उर ब्योम।।42(क)।। एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ। तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ।।42(ख)।।

चौपाई 41

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी।। राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया।। तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा।। सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा।। करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी।। गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई।। प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता।। मोरे प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी।। जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही।। यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं।।

दोहा 43ख

काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि। तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि।।43।।

चौपाई 42

सुनि मुनि कह पुरान श्रुति संता। मोह बिपिन कहुँ नारि बसंता।। जप तप नेम जलाश्रय झारी। होइ ग्रीषम सोषइ सब नारी।। काम क्रोध मद मत्सर भेका। इन्हहि हरषप्रद बरषा एका।। दुर्बासना कुमुद समुदाई। तिन्ह कहँ सरद सदा सुखदाई।। धर्म सकल सरसीरुह बृंदा। होइ हिम तिन्हहि दहइ सुख मंदा।। पुनि ममता जवास बहुताई। पलुहइ नारि सिसिर रितु पाई।। पाप उलूक निकर सुखकारी। नारि निबिड़ रजनी अँधिआरी।। बुधि बल सील सत्य सब मीना। बनसी सम त्रिय कहहिं प्रबीना।।

दोहा 44

अवगुन मूल सूलप्रद प्रमदा सब दुख खानि। ताते कीन्ह निवारन मुनि मैं यह जियँ जानि।।44।।

चौपाई 43

सुनि रघुपति के बचन सुहाए। मुनि तन पुलक नयन भरि आए।। कहहु कवन प्रभु कै असि रीती। सेवक पर ममता अरु प्रीती।। जे न भजहिं अस प्रभु भ्रम त्यागी। ग्यान रंक नर मंद अभागी।। पुनि सादर बोले मुनि नारद। सुनहु राम बिग्यान बिसारद।। संतन्ह के लच्छन रघुबीरा। कहहु नाथ भव भंजन भीरा।। सुनु मुनि संतन्ह के गुन कहऊँ। जिन्ह ते मैं उन्ह कें बस रहऊँ।। षट बिकार जित अनघ अकामा। अचल अकिंचन सुचि सुखधामा।। अमितबोध अनीह मितभोगी। सत्यसार कबि कोबिद जोगी।। सावधान मानद मदहीना। धीर धर्म गति परम प्रबीना।।

दोहा 45

गुनागार संसार दुख रहित बिगत संदेह।। तजि मम चरन सरोज प्रिय तिन्ह कहुँ देह न गेह।।45।।