Skip to main content
राम

3

अरण्यकाण्ड

Aranya Kanda

Life in the forest: encounters with sages, Surpanakha, the golden deer, Sita's abduction by Ravana.

98 verses

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 4 of 5 · Verses 61–80 of 98

चौपाई 26

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।। आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।। जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।। भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई।। मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।। बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू।। सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा।। जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं।। सो दससीस स्वान की नाई। इत उत चितइ चला भड़िहाई।। इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज बुधि बल लेसा।। नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।। कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं।। तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा।। कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा।। जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।। सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना।।

दोहा 28

क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ।।28।।

चौपाई 27

हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।। आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक।। हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा।। बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।। बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।। सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।। गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।। अधम निसाचर लीन्हे जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई।। सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा।। धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसे।। रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही।। आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।। की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा।। सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।। तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू।। राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा।। उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।। धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।। चौचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही।। तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना।। काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अदभुत करनी।। सीतहि जानि चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी।। करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता।। गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी।। एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ।।

दोहा 30क

हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ। तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ।।29(क)।। जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम। सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम।।29(ख)।।

चौपाई 28

रघुपति अनुजहि आवत देखी। बाहिज चिंता कीन्हि बिसेषी।। जनकसुता परिहरिहु अकेली। आयहु तात बचन मम पेली।। निसिचर निकर फिरहिं बन माहीं। मम मन सीता आश्रम नाहीं।। गहि पद कमल अनुज कर जोरी। कहेउ नाथ कछु मोहि न खोरी।। अनुज समेत गए प्रभु तहवाँ। गोदावरि तट आश्रम जहवाँ।। आश्रम देखि जानकी हीना। भए बिकल जस प्राकृत दीना।। हा गुन खानि जानकी सीता। रूप सील ब्रत नेम पुनीता।। लछिमन समुझाए बहु भाँती। पूछत चले लता तरु पाँती।। हे खग मृग हे मधुकर श्रेनी। तुम्ह देखी सीता मृगनैनी।। खंजन सुक कपोत मृग मीना। मधुप निकर कोकिला प्रबीना।। कुंद कली दाड़िम दामिनी। कमल सरद ससि अहिभामिनी।। बरुन पास मनोज धनु हंसा। गज केहरि निज सुनत प्रसंसा।। श्रीफल कनक कदलि हरषाहीं। नेकु न संक सकुच मन माहीं।। सुनु जानकी तोहि बिनु आजू। हरषे सकल पाइ जनु राजू।। किमि सहि जात अनख तोहि पाहीं । प्रिया बेगि प्रगटसि कस नाहीं।। एहि बिधि खौजत बिलपत स्वामी। मनहुँ महा बिरही अति कामी।। पूरनकाम राम सुख रासी। मनुज चरित कर अज अबिनासी।। आगे परा गीधपति देखा। सुमिरत राम चरन जिन्ह रेखा।।

दोहा 30ख

कर सरोज सिर परसेउ कृपासिंधु रधुबीर।। निरखि राम छबि धाम मुख बिगत भई सब पीर।।30।।

चौपाई 29

तब कह गीध बचन धरि धीरा । सुनहु राम भंजन भव भीरा।। नाथ दसानन यह गति कीन्ही। तेहि खल जनकसुता हरि लीन्ही।। लै दच्छिन दिसि गयउ गोसाई। बिलपति अति कुररी की नाई।। दरस लागी प्रभु राखेंउँ प्राना। चलन चहत अब कृपानिधाना।। राम कहा तनु राखहु ताता। मुख मुसकाइ कही तेहिं बाता।। जा कर नाम मरत मुख आवा। अधमउ मुकुत होई श्रुति गावा।। सो मम लोचन गोचर आगें। राखौं देह नाथ केहि खाँगें।। जल भरि नयन कहहिं रघुराई। तात कर्म निज ते गतिं पाई।। परहित बस जिन्ह के मन माहीं। तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं।। तनु तजि तात जाहु मम धामा। देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।।

दोहा 31

सीता हरन तात जनि कहहु पिता सन जाइ।। जौं मैं राम त कुल सहित कहिहि दसानन आइ।।31।।

चौपाई 30

गीध देह तजि धरि हरि रुपा। भूषन बहु पट पीत अनूपा।। स्याम गात बिसाल भुज चारी। अस्तुति करत नयन भरि बारी।।

छन्द 4

जय राम रूप अनूप निर्गुन सगुन गुन प्रेरक सही। दससीस बाहु प्रचंड खंडन चंड सर मंडन मही।। पाथोद गात सरोज मुख राजीव आयत लोचनं। नित नौमि रामु कृपाल बाहु बिसाल भव भय मोचनं।।1।। बलमप्रमेयमनादिमजमब्यक्तमेकमगोचरं। गोबिंद गोपर द्वंद्वहर बिग्यानघन धरनीधरं।। जे राम मंत्र जपंत संत अनंत जन मन रंजनं। नित नौमि राम अकाम प्रिय कामादि खल दल गंजनं।।2। जेहि श्रुति निरंजन ब्रह्म ब्यापक बिरज अज कहि गावहीं।। करि ध्यान ग्यान बिराग जोग अनेक मुनि जेहि पावहीं।। सो प्रगट करुना कंद सोभा बृंद अग जग मोहई। मम हृदय पंकज भृंग अंग अनंग बहु छबि सोहई।।3।। जो अगम सुगम सुभाव निर्मल असम सम सीतल सदा। पस्यंति जं जोगी जतन करि करत मन गो बस सदा।। सो राम रमा निवास संतत दास बस त्रिभुवन धनी। मम उर बसउ सो समन संसृति जासु कीरति पावनी।।4।।

दोहा 32

अबिरल भगति मागि बर गीध गयउ हरिधाम। तेहि की क्रिया जथोचित निज कर कीन्ही राम।।32।।

चौपाई 31

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला।। गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्हि जो जाचत जोगी।। सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तजि होहिं बिषय अनुरागी।। पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई।। संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन।। आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता।। दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा।। सुनु गंधर्ब कहउँ मै तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही।।

दोहा 33

मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव। मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव।।33।।

चौपाई 32

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता।। पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना।। कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा।। रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई।। ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा।। सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए।। सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला।। स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई।। प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा।। सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे।।

दोहा 34

कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि। प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि।।34।।

चौपाई 33

पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी।। केहि बिधि अस्तुति करौ तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी।। अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी।। कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता।। जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई।। भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा।। नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं।। प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा।।

दोहा 35

गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान।।35।।

चौपाई 34

मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा।। छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा।। सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा।। आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा।। नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना।। नव महुँ एकउ जिन्ह के होई। नारि पुरुष सचराचर कोई।। सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरे। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें।। जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई।। मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा।। जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी।। पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई।। सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा।। बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई।।

छन्द 8

कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदयँ पद पंकज धरे। तजि जोग पावक देह हरि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे।। नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू। बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू।।

दोहा 36

जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।36।।
Continue reading →