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राम

7

उत्तरकाण्ड

Uttara Kanda

Ram's coronation, the nature of bhakti, and Shiva-Parvati's dialogue on devotion.

270 verses

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Passage 7 of 14 · Verses 121–140 of 270

दोहा 56

-सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग। कूजत कल रव हंस गन गुंजत मजुंल भृंग।।56।।

चौपाई 55

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई। तासु नास कल्पांत न होई।। माया कृत गुन दोष अनेका। मोह मनोज आदि अबिबेका।। रहे ब्यापि समस्त जग माहीं। तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं।। तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा। सो सुनु उमा सहित अनुरागा।। पीपर तरु तर ध्यान सो धरई। जाप जग्य पाकरि तर करई।। आँब छाहँ कर मानस पूजा। तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा।। बर तर कह हरि कथा प्रसंगा। आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा।। राम चरित बिचीत्र बिधि नाना। प्रेम सहित कर सादर गाना।। सुनहिं सकल मति बिमल मराला। बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला।। जब मैं जाइ सो कौतुक देखा। उर उपजा आनंद बिसेषा।।

दोहा 57

तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास। सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास।।57।।

चौपाई 56

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा। मैं जेहि समय गयउँ खग पासा।। अब सो कथा सुनहु जेही हेतू। गयउ काग पहिं खग कुल केतू।। जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा। समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा।। इंद्रजीत कर आपु बँधायो। तब नारद मुनि गरुड़ पठायो।। बंधन काटि गयो उरगादा। उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा।। प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती। करत बिचार उरग आराती।। ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा। माया मोह पार परमीसा।। सो अवतार सुनेउँ जग माहीं। देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं।।

दोहा 58

-भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम। खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम।।58।।

चौपाई 57

नाना भाँति मनहि समुझावा। प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा।। खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई। भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई।। ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं। कहेसि जो संसय निज मन माहीं।। सुनि नारदहि लागि अति दाया। सुनु खग प्रबल राम कै माया।। जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई। बरिआई बिमोह मन करई।। जेहिं बहु बार नचावा मोही। सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही।। महामोह उपजा उर तोरें। मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें।। चतुरानन पहिं जाहु खगेसा। सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा।।

दोहा 59

अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान। हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान।।59।।

चौपाई 58

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ। निज संदेह सुनावत भयऊ।। सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा। समुझि प्रताप प्रेम अति छावा।। मन महुँ करइ बिचार बिधाता। माया बस कबि कोबिद ग्याता।। हरि माया कर अमिति प्रभावा। बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा।। अग जगमय जग मम उपराजा। नहिं आचरज मोह खगराजा।। तब बोले बिधि गिरा सुहाई। जान महेस राम प्रभुताई।। बैनतेय संकर पहिं जाहू। तात अनत पूछहु जनि काहू।। तहँ होइहि तव संसय हानी। चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी।।

दोहा 60

परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास। जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास।।60।।

चौपाई 59

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा। पुनि आपन संदेह सुनावा।। सुनि ता करि बिनती मृदु बानी। परेम सहित मैं कहेउँ भवानी।। मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही। कवन भाँति समुझावौं तोही।। तबहि होइ सब संसय भंगा। जब बहु काल करिअ सतसंगा।। सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई। नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई।। जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना। प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना।। नित हरि कथा होत जहँ भाई। पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई।। जाइहि सुनत सकल संदेहा। राम चरन होइहि अति नेहा।।

दोहा 61

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग।।61।।

चौपाई 60

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा। किएँ जोग तप ग्यान बिरागा।। उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला। तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला।। राम भगति पथ परम प्रबीना। ग्यानी गुन गृह बहु कालीना।। राम कथा सो कहइ निरंतर। सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर।। जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी। होइहि मोह जनित दुख दूरी।। मैं जब तेहि सब कहा बुझाई। चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई।। ताते उमा न मैं समुझावा। रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा।। होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना। सो खौवै चह कृपानिधाना।। कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा। समुझइ खग खगही कै भाषा।। प्रभु माया बलवंत भवानी। जाहि न मोह कवन अस ग्यानी।।

दोहा 63

ग्यानि भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान। ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान।।62(क)।। सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन। अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान।।62(ख)।।

चौपाई 61

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा। मति अकुंठ हरि भगति अखंडा।। देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ। माया मोह सोच सब गयऊ।। करि तड़ाग मज्जन जलपाना। बट तर गयउ हृदयँ हरषाना।। बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए। सुनै राम के चरित सुहाए।। कथा अरंभ करै सोइ चाहा। तेही समय गयउ खगनाहा।। आवत देखि सकल खगराजा। हरषेउ बायस सहित समाजा।। अति आदर खगपति कर कीन्हा। स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा।। करि पूजा समेत अनुरागा। मधुर बचन तब बोलेउ कागा।।

दोहा 64क

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज। आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज।।63(क)।। सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस। जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस।।63(ख)।।

चौपाई 62

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ। सो सब भयउ दरस तव पायउँ।। देखि परम पावन तव आश्रम। गयउ मोह संसय नाना भ्रम।। अब श्रीराम कथा अति पावनि। सदा सुखद दुख पुंज नसावनि।। सादर तात सुनावहु मोही। बार बार बिनवउँ प्रभु तोही।। सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता। सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता।। भयउ तासु मन परम उछाहा। लाग कहै रघुपति गुन गाहा।। प्रथमहिं अति अनुराग भवानी। रामचरित सर कहेसि बखानी।। पुनि नारद कर मोह अपारा। कहेसि बहुरि रावन अवतारा।। प्रभु अवतार कथा पुनि गाई। तब सिसु चरित कहेसि मन लाई।।

दोहा 64ख

बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह। रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह।।64।।

चौपाई 63

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा। पुनि नृप बचन राज रस भंगा।। पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा। कहेसि राम लछिमन संबादा।। बिपिन गवन केवट अनुरागा। सुरसरि उतरि निवास प्रयागा।। बालमीक प्रभु मिलन बखाना। चित्रकूट जिमि बसे भगवाना।। सचिवागवन नगर नृप मरना। भरतागवन प्रेम बहु बरना।। करि नृप क्रिया संग पुरबासी। भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी।। पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए। लै पादुका अवधपुर आए।। भरत रहनि सुरपति सुत करनी। प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी।।

दोहा 65

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग।। बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग।।65।।

चौपाई 64

कहि दंडक बन पावनताई। गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई।। पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा। भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा।। पुनि लछिमन उपदेस अनूपा। सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा।। खर दूषन बध बहुरि बखाना। जिमि सब मरमु दसानन जाना।। दसकंधर मारीच बतकहीं। जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही।। पुनि माया सीता कर हरना। श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना।। पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही। बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही।। बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा। जेहि बिधि गए सरोबर तीरा।।
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