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राम

7

उत्तरकाण्ड

Uttara Kanda

Ram's coronation, the nature of bhakti, and Shiva-Parvati's dialogue on devotion.

270 verses

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Passage 5 of 14 · Verses 81–100 of 270

दोहा 36

नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह। केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह।।36।।

चौपाई 35

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई।। संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई।। श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई।। सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन।। संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई।। संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता।। संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।। काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई।।

दोहा 37

ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड। अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड।।37।।

चौपाई 36

बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर।। सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी।। कोमलचित दीनन्ह पर दाया। मन बच क्रम मम भगति अमाया।। सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी।। बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन।। सीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री।। ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर।। सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं।।

दोहा 38

निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज। ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज।।38।।

चौपाई 37

सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ।। तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कलपहि घालइ हरहाई।। खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी। जरहिं सदा पर संपति देखी।। जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई। हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई।। काम क्रोध मद लोभ परायन। निर्दय कपटी कुटिल मलायन।। बयरु अकारन सब काहू सों। जो कर हित अनहित ताहू सों।। झूठइ लेना झूठइ देना। झूठइ भोजन झूठ चबेना।। बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा। खाइ महा अति हृदय कठोरा।।

दोहा 39

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद।।39।।

चौपाई 38

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन। सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न।। काहू की जौं सुनहिं बड़ाई। स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई।। जब काहू कै देखहिं बिपती। सुखी भए मानहुँ जग नृपती।। स्वारथ रत परिवार बिरोधी। लंपट काम लोभ अति क्रोधी।। मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं। आपु गए अरु घालहिं आनहिं।। करहिं मोह बस द्रोह परावा। संत संग हरि कथा न भावा।। अवगुन सिंधु मंदमति कामी। बेद बिदूषक परधन स्वामी।। बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा। दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा।।

दोहा 40

ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं। द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं।।40।।

चौपाई 39

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई। पर पीड़ा सम नहिं अधमाई।। निर्नय सकल पुरान बेद कर। कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर।। नर सरीर धरि जे पर पीरा। करहिं ते सहहिं महा भव भीरा।। करहिं मोह बस नर अघ नाना। स्वारथ रत परलोक नसाना।। कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता। सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता।। अस बिचारि जे परम सयाने। भजहिं मोहि संसृत दुख जाने।। त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक। भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक।। संत असंतन्ह के गुन भाषे। ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे।।

दोहा 41

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक। गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक।।41।।

चौपाई 40

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई। हरषे प्रेम न हृदयँ समाई।। करहिं बिनय अति बारहिं बारा। हनूमान हियँ हरष अपारा।। पुनि रघुपति निज मंदिर गए। एहि बिधि चरित करत नित नए।। बार बार नारद मुनि आवहिं। चरित पुनीत राम के गावहिं।। नित नव चरन देखि मुनि जाहीं। ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं।। सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं। पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं।। सनकादिक नारदहि सराहहिं। जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं।। सुनि गुन गान समाधि बिसारी।। सादर सुनहिं परम अधिकारी।।

दोहा 42

जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान। जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान।।42।।

चौपाई 41

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए।। बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन।। सनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी।। नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई।। सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई।। जौं अनीति कछु भाषौं भाई। तौं मोहि बरजहु भय बिसराई।। बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा।। साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाइ न जेहिं परलोक सँवारा।।

दोहा 43

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ।।43।।

चौपाई 42

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई।। नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं।। ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई।। आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी।। फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा।। कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही।। नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो।। करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा।।

दोहा 44

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ।।44।।

चौपाई 43

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू।। सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई।। ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका।। करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ।। भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी।। पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता।। पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा।। सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा।।

दोहा 45

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि। संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि।।45।।

चौपाई 44

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा।। सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई।। मोर दास कहाइ नर आसा। करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा।। बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई। एहि आचरन बस्य मैं भाई।। बैर न बिग्रह आस न त्रासा। सुखमय ताहि सदा सब आसा।। अनारंभ अनिकेत अमानी। अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी।। प्रीति सदा सज्जन संसर्गा। तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा।। भगति पच्छ हठ नहिं सठताई। दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई।।
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