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राम

5

सुन्दरकाण्ड

Sundara Kanda

Hanuman's journey to Lanka: his leap across the ocean, finding Sita, burning Lanka.

121 verses

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Passage 6 of 7 · Verses 101–120 of 121

दोहा 49

रावन क्रोध अनल निज स्वास समीर प्रचंड। जरत बिभीषनु राखेउ दीन्हेहु राजु अखंड।।49(क)।। जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ। सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्ह रघुनाथ।।49(ख)।।

चौपाई 50

अस प्रभु छाड़ि भजहिं जे आना। ते नर पसु बिनु पूँछ बिषाना।। निज जन जानि ताहि अपनावा। प्रभु सुभाव कपि कुल मन भावा।। पुनि सर्बग्य सर्ब उर बासी। सर्बरूप सब रहित उदासी।। बोले बचन नीति प्रतिपालक। कारन मनुज दनुज कुल घालक।। सुनु कपीस लंकापति बीरा। केहि बिधि तरिअ जलधि गंभीरा।। संकुल मकर उरग झष जाती। अति अगाध दुस्तर सब भाँती।। कह लंकेस सुनहु रघुनायक। कोटि सिंधु सोषक तव सायक।। जद्यपि तदपि नीति असि गाई। बिनय करिअ सागर सन जाई।।

दोहा 50

प्रभु तुम्हार कुलगुर जलधि कहिहि उपाय बिचारि। बिनु प्रयास सागर तरिहि सकल भालु कपि धारि।।50।।

चौपाई 51

सखा कही तुम्ह नीकि उपाई। करिअ दैव जौं होइ सहाई।। मंत्र न यह लछिमन मन भावा। राम बचन सुनि अति दुख पावा।। नाथ दैव कर कवन भरोसा। सोषिअ सिंधु करिअ मन रोसा।। कादर मन कहुँ एक अधारा। दैव दैव आलसी पुकारा।। सुनत बिहसि बोले रघुबीरा। ऐसेहिं करब धरहु मन धीरा।। अस कहि प्रभु अनुजहि समुझाई। सिंधु समीप गए रघुराई।। प्रथम प्रनाम कीन्ह सिरु नाई। बैठे पुनि तट दर्भ डसाई।। जबहिं बिभीषन प्रभु पहिं आए। पाछें रावन दूत पठाए।।

दोहा 51

सकल चरित तिन्ह देखे धरें कपट कपि देह। प्रभु गुन हृदयँ सराहहिं सरनागत पर नेह।।51।।

चौपाई 52

प्रगट बखानहिं राम सुभाऊ। अति सप्रेम गा बिसरि दुराऊ।। रिपु के दूत कपिन्ह तब जाने। सकल बाँधि कपीस पहिं आने।। कह सुग्रीव सुनहु सब बानर। अंग भंग करि पठवहु निसिचर।। सुनि सुग्रीव बचन कपि धाए। बाँधि कटक चहु पास फिराए।। बहु प्रकार मारन कपि लागे। दीन पुकारत तदपि न त्यागे।। जो हमार हर नासा काना। तेहि कोसलाधीस कै आना।। सुनि लछिमन सब निकट बोलाए। दया लागि हँसि तुरत छोडाए।। रावन कर दीजहु यह पाती। लछिमन बचन बाचु कुलघाती।।

दोहा 52

कहेहु मुखागर मूढ़ सन मम संदेसु उदार। सीता देइ मिलेहु न त आवा काल तुम्हार।।52।।

चौपाई 53

तुरत नाइ लछिमन पद माथा। चले दूत बरनत गुन गाथा।। कहत राम जसु लंकाँ आए। रावन चरन सीस तिन्ह नाए।। बिहसि दसानन पूँछी बाता। कहसि न सुक आपनि कुसलाता।। पुनि कहु खबरि बिभीषन केरी। जाहि मृत्यु आई अति नेरी।। करत राज लंका सठ त्यागी। होइहि जब कर कीट अभागी।। पुनि कहु भालु कीस कटकाई। कठिन काल प्रेरित चलि आई।। जिन्ह के जीवन कर रखवारा। भयउ मृदुल चित सिंधु बिचारा।। कहु तपसिन्ह कै बात बहोरी। जिन्ह के हृदयँ त्रास अति मोरी।।

दोहा 53

-की भइ भेंट कि फिरि गए श्रवन सुजसु सुनि मोर। कहसि न रिपु दल तेज बल बहुत चकित चित तोर।।53।।

चौपाई 54

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।। मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।। रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।। श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।। पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।। नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।। जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।। अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।

दोहा 54

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि। दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

चौपाई 55

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।। राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रेलोकहि गनहीं।। अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।। नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।। परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।। सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।। मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।। गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।

दोहा 55

-सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम। रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

चौपाई 56

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।। सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।। तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।। सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।। सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।। मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।। सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।। सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।। रामानुज दीन्ही यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।। बिहसि बाम कर लीन्ही रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

दोहा 56

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस। राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।। की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग। होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

चौपाई 57

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।। भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।। कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।। सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।। अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।। मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।। जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे। जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।। नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।। करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।। रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।। बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

दोहा 57

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

चौपाई 58

लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू।। सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती।। ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी।। क्रोधिहि सम कामिहि हरि कथा। ऊसर बीज बएँ फल जथा।। अस कहि रघुपति चाप चढ़ावा। यह मत लछिमन के मन भावा।। संघानेउ प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला।। मकर उरग झष गन अकुलाने। जरत जंतु जलनिधि जब जाने।। कनक थार भरि मनि गन नाना। बिप्र रूप आयउ तजि माना।।

दोहा 58

काटेहिं पइ कदरी फरइ कोटि जतन कोउ सींच। बिनय न मान खगेस सुनु डाटेहिं पइ नव नीच।।58।।

चौपाई 59

सभय सिंधु गहि पद प्रभु केरे। छमहु नाथ सब अवगुन मेरे।। गगन समीर अनल जल धरनी। इन्ह कइ नाथ सहज जड़ करनी।। तव प्रेरित मायाँ उपजाए। सृष्टि हेतु सब ग्रंथनि गाए।। प्रभु आयसु जेहि कहँ जस अहई। सो तेहि भाँति रहे सुख लहई।। प्रभु भल कीन्ही मोहि सिख दीन्ही। मरजादा पुनि तुम्हरी कीन्ही।। ढोल गवाँर सूद्र पसु नारी। सकल ताड़ना के अधिकारी।। प्रभु प्रताप मैं जाब सुखाई। उतरिहि कटकु न मोरि बड़ाई।। प्रभु अग्या अपेल श्रुति गाई। करौं सो बेगि जौ तुम्हहि सोहाई।।
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