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राम

6

लंकाकाण्ड

Lanka Kanda

The great battle between Ram's army and Ravana, and the victory of dharma.

273 verses

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Passage 9 of 14 · Verses 161–180 of 273

छन्द 4

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते। भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते।। गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने। जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने।।

दोहा 78

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम। भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम।।78।।

चौपाई 79

चलेउ निसाचर कटकु अपारा। चतुरंगिनी अनी बहु धारा।। बिबिध भाँति बाहन रथ जाना। बिपुल बरन पताक ध्वज नाना।। चले मत्त गज जूथ घनेरे। प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे।। बरन बरद बिरदैत निकाया। समर सूर जानहिं बहु माया।। अति बिचित्र बाहिनी बिराजी। बीर बसंत सेन जनु साजी।। चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं। छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं।। उठी रेनु रबि गयउ छपाई। मरुत थकित बसुधा अकुलाई।। पनव निसान घोर रव बाजहिं। प्रलय समय के घन जनु गाजहिं।। भेरि नफीरि बाज सहनाई। मारू राग सुभट सुखदाई।। केहरि नाद बीर सब करहीं। निज निज बल पौरुष उच्चरहीं।। कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा। मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा।। हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई। अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई।। यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई। धाए करि रघुबीर दोहाई।।

छन्द 5

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते। मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते।। नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं। जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं।।

दोहा 79

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि। भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि।।79।।

चौपाई 80

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा। देखि बिभीषन भयउ अधीरा।। अधिक प्रीति मन भा संदेहा। बंदि चरन कह सहित सनेहा।। नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना। केहि बिधि जितब बीर बलवाना।। सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना।। सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका।। बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे।। ईस भजनु सारथी सुजाना। बिरति चर्म संतोष कृपाना।। दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा। बर बिग्यान कठिन कोदंडा।। अमल अचल मन त्रोन समाना। सम जम नियम सिलीमुख नाना।। कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा।। सखा धर्ममय अस रथ जाकें। जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें।।

दोहा 81क

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर। जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर।।80(क)।। सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज। एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज।।80(ख)।। उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान। लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन।।80(ग)।।

चौपाई 81

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना। देखत रन नभ चढ़े बिमाना।। हमहू उमा रहे तेहि संगा। देखत राम चरित रन रंगा।। सुभट समर रस दुहु दिसि माते। कपि जयसील राम बल ताते।। एक एक सन भिरहिं पचारहिं। एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं।। मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं। सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं।। उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं। गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं।। निसिचर भट महि गाड़हि भालू। ऊपर ढारि देहिं बहु बालू।। बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे। देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे।।

छन्द 6

क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं। मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं।। मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं। चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं।। धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं। प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं।। धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही। जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही।।

दोहा 81ख

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप। रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप।।81।।

चौपाई 82

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर। सन्मुख चले हूह दै बंदर।। गहि कर पादप उपल पहारा। डारेन्हि ता पर एकहिं बारा।। लागहिं सैल बज्र तन तासू। खंड खंड होइ फूटहिं आसू।। चला न अचल रहा रथ रोपी। रन दुर्मद रावन अति कोपी।। इत उत झपटि दपटि कपि जोधा। मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा।। चले पराइ भालु कपि नाना। त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना।। पाहि पाहि रघुबीर गोसाई। यह खल खाइ काल की नाई।। तेहि देखे कपि सकल पराने। दसहुँ चाप सायक संधाने।।

छन्द 7

संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं। रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं।। भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे। रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे।।

दोहा 82

निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ। लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ।।82।।

चौपाई 83

रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू।। खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती।। अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा। लछिमन किए सकल सत खंडा।। कोटिन्ह आयुध रावन डारे। तिल प्रवान करि काटि निवारे।। पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा। स्यंदनु भंजि सारथी मारा।। सत सत सर मारे दस भाला। गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला।। पुनि सत सर मारा उर माहीं। परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं।। उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी। छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी।।

छन्द 8

सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही।। ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी।।

दोहा 83

देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर। आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर।।83।।

चौपाई 84

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा। उठा सँभारि बहुत रिस भरा।। मुठिका एक ताहि कपि मारा। परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा।। मुरुछा गै बहोरि सो जागा। कपि बल बिपुल सराहन लागा।। धिग धिग मम पौरुष धिग मोही। जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही।। अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो। देखि दसानन बिसमय पायो।। कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता। तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता।। सुनत बचन उठि बैठ कृपाला। गई गगन सो सकति कराला।। पुनि कोदंड बान गहि धाए। रिपु सन्मुख अति आतुर आए।।

छन्द 9

आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो। गिर् यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो।। सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो। रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो।।

दोहा 84

उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य। राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य।।84।।

चौपाई 85

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई। सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई।। नाथ करइ रावन एक जागा। सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा।। पठवहु नाथ बेगि भट बंदर। करहिं बिधंस आव दसकंधर।। प्रात होत प्रभु सुभट पठाए। हनुमदादि अंगद सब धाए।। कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका। पैठे रावन भवन असंका।। जग्य करत जबहीं सो देखा। सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा।। रन ते निलज भाजि गृह आवा। इहाँ आइ बक ध्यान लगावा।। अस कहि अंगद मारा लाता। चितव न सठ स्वारथ मन राता।।
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