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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 9 of 39 · Verses 161–180 of 770

चौपाई 74

उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना।। अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।। नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।। संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए।। कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।। बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोई खाई।। पुनि परिहरे सुखानेउ परना। उमहि नाम तब भयउ अपरना।। देखि उमहि तप खीन सरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा।।

दोहा 74

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिजाकुमारि। परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि।।74।।

चौपाई 75

अस तपु काहुँ न कीन्ह भवानी। भउ अनेक धीर मुनि ग्यानी।। अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।। आवै पिता बोलावन जबहीं। हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं।। मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा।। सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी।। उमा चरित सुंदर मैं गावा। सुनहु संभु कर चरित सुहावा।। जब तें सती जाइ तनु त्यागा। तब सें सिव मन भयउ बिरागा।। जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा।।

दोहा 75

चिदानन्द सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।75।।

चौपाई 76

कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।। जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना।। एहि बिधि गयउ कालु बहु बीती। नित नै होइ राम पद प्रीती।। नैमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदयँ भगति कै रेखा।। प्रगटै रामु कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला।। बहु प्रकार संकरहि सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा।। बहुबिधि राम सिवहि समुझावा। पारबती कर जन्मु सुनावा।। अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।

दोहा 76

अब बिनती मम सुनेहु सिव जौं मो पर निज नेहु। जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु।।76।।

चौपाई 77

कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।। सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।। मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।। तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी।। प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।। कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।। अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी।। तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए।।

दोहा 77

पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु। गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु।।77।।

चौपाई 78

रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।। बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।। केहि अवराधहु का तुम्ह चहहू। हम सन सत्य मरमु किन कहहू।। कहत बचत मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।। मनु हठ परा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।। नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना।। देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिअ सदा सिवहि भरतारा।।

दोहा 78

सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तब देह। नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह।।78।।

चौपाई 79

दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवनु न देखा आई।। चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनककसिपु कर पुनि अस हाला।। नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवनु भिखारी।। मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबही चह कीन्हा।। तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।। निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली।। कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ। भल भूलिहु ठग के बौराएँ।। पंच कहें सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।

दोहा 79

अब सुख सोवत सोचु नहि भीख मागि भव खाहिं। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं।।79।।

चौपाई 80

अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ बरु नीक बिचारा।। अति सुंदर सुचि सुखद सुसीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।। दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुंठ निवासी।। अस बरु तुम्हहि मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी।। सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ न छूट छूटै बरु देहा।। कनकउ पुनि पषान तें होई। जारेहुँ सहजु न परिहर सोई।। नारद बचन न मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।। गुर कें बचन प्रतीति न जेही। सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही।।

दोहा 80

महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम। जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम।।80।।

चौपाई 81

जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हारि धरि सीसा।। अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा।। जौं तुम्हरे हठ हृदयँ बिसेषी। रहि न जाइ बिनु किएँ बरेषी।। तौ कौतुकिअन्ह आलसु नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।। जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।। तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहि सत बार महेसू।। मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।। देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी। जय जय जगदंबिके भवानी।।

दोहा 81

तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु।।81।।

चौपाई 82

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए।। बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।। भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।। मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।। तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।। तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते।। अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई।। तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।

दोहा 82

सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।82।।

चौपाई 83

मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई।। सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।। तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।। जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।। पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।। तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई।। एहि बिधि भलेहि देवहित होई। मर अति नीक कहइ सबु कोई।। अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू।।

दोहा 83

सुरन्ह कहीं निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार। संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार।।83।।
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