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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 20 of 39 · Verses 381–400 of 770

दोहा 176

उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप। तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप।।176।।

चौपाई 177

कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई। परम उग्र नहिं बरनि सो जाई।। गयउ निकट तप देखि बिधाता। मागहु बर प्रसन्न मैं ताता।। करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा।। हम काहू के मरहिं न मारें। बानर मनुज जाति दुइ बारें।। एवमस्तु तुम्ह बड़ तप कीन्हा। मैं ब्रह्माँ मिलि तेहि बर दीन्हा।। पुनि प्रभु कुंभकरन पहिं गयऊ। तेहि बिलोकि मन बिसमय भयऊ।। जौं एहिं खल नित करब अहारू। होइहि सब उजारि संसारू।। सारद प्रेरि तासु मति फेरी। मागेसि नीद मास षट केरी।।

दोहा 177

गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु। तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु।।177।।

चौपाई 178

तिन्हि देइ बर ब्रह्म सिधाए। हरषित ते अपने गृह आए।। मय तनुजा मंदोदरि नामा। परम सुंदरी नारि ललामा।। सोइ मयँ दीन्हि रावनहि आनी। होइहि जातुधानपति जानी।। हरषित भयउ नारि भलि पाई। पुनि दोउ बंधु बिआहेसि जाई।। गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी। बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी।। सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा। कनक रचित मनिभवन अपारा।। भोगावति जसि अहिकुल बासा। अमरावति जसि सक्रनिवासा।। तिन्ह तें अधिक रम्य अति बंका। जग बिख्यात नाम तेहि लंका।।

सोरठा 178

खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव। कनक कोट मनि खचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव।।178(क)।। हरिप्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ। सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ।।178(ख)।।

चौपाई 179

रहे तहाँ निसिचर भट भारे। ते सब सुरन्ह समर संघारे।। अब तहँ रहहिं सक्र के प्रेरे। रच्छक कोटि जच्छपति केरे।। दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई। सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई।। देखि बिकट भट बड़ि कटकाई। जच्छ जीव लै गए पराई।। फिरि सब नगर दसानन देखा। गयउ सोच सुख भयउ बिसेषा।। सुंदर सहज अगम अनुमानी। कीन्हि तहाँ रावन रजधानी।। जेहि जस जोग बाँटि गृह दीन्हे। सुखी सकल रजनीचर कीन्हे।। एक बार कुबेर पर धावा। पुष्पक जान जीति लै आवा।।

दोहा 179

कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ। मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ।।179।।

चौपाई 180

सुख संपति सुत सेन सहाई। जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई।। नित नूतन सब बाढ़त जाई। जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई।। अतिबल कुंभकरन अस भ्राता। जेहि कहुँ नहिं प्रतिभट जग जाता।। करइ पान सोवइ षट मासा। जागत होइ तिहुँ पुर त्रासा।। जौं दिन प्रति अहार कर सोई। बिस्व बेगि सब चौपट होई।। समर धीर नहिं जाइ बखाना। तेहि सम अमित बीर बलवाना।। बारिदनाद जेठ सुत तासू। भट महुँ प्रथम लीक जग जासू।। जेहि न होइ रन सनमुख कोई। सुरपुर नितहिं परावन होई।।

दोहा 180

कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय। एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय।।180।।

चौपाई 181

कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया।। दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा।। सुत समूह जन परिजन नाती। गे को पार निसाचर जाती।। सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी।। सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा।। ते सनमुख नहिं करही लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई।। तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई।। द्विजभोजन मख होम सराधा।।सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा।।

दोहा 181

छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ। तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ।।181।।

चौपाई 182

मेघनाद कहुँ पुनि हँकरावा। दीन्ही सिख बलु बयरु बढ़ावा।। जे सुर समर धीर बलवाना। जिन्ह कें लरिबे कर अभिमाना।। तिन्हहि जीति रन आनेसु बाँधी। उठि सुत पितु अनुसासन काँधी।। एहि बिधि सबही अग्या दीन्ही। आपुनु चलेउ गदा कर लीन्ही।। चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्त्रवहिं सुर रवनी।। रावन आवत सुनेउ सकोहा। देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा।। दिगपालन्ह के लोक सुहाए। सूने सकल दसानन पाए।। पुनि पुनि सिंघनाद करि भारी। देइ देवतन्ह गारि पचारी।। रन मद मत्त फिरइ जग धावा। प्रतिभट खौजत कतहुँ न पावा।। रबि ससि पवन बरुन धनधारी। अगिनि काल जम सब अधिकारी।। किंनर सिद्ध मनुज सुर नागा। हठि सबही के पंथहिं लागा।। ब्रह्मसृष्टि जहँ लगि तनुधारी। दसमुख बसबर्ती नर नारी।। आयसु करहिं सकल भयभीता। नवहिं आइ नित चरन बिनीता।।

सोरठा 182

भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र। मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र।।182(क)।। देव जच्छ गंधर्व नर किंनर नाग कुमारि। जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि।।182ख।।

चौपाई 183

इंद्रजीत सन जो कछु कहेऊ। सो सब जनु पहिलेहिं करि रहेऊ।। प्रथमहिं जिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा। तिन्ह कर चरित सुनहु जो कीन्हा।। देखत भीमरूप सब पापी। निसिचर निकर देव परितापी।। करहि उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।। जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।। जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं।। सुभ आचरन कतहुँ नहिं होई। देव बिप्र गुरू मान न कोई।। नहिं हरिभगति जग्य तप ग्याना। सपनेहुँ सुनिअ न बेद पुराना।।

छन्द 18

जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा। आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा।। अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहि काना। तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना।।

दोहा 183

बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं। हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति।।183।।

चौपाई 184

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।। मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।। जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।। अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।। गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही। जस मोहि गरुअ एक परद्रोही।। सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता।। धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।। निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई।।

छन्द 19

सुर मुनि गंधर्बा मिलि करि सर्बा गे बिरंचि के लोका। सँग गोतनुधारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।। ब्रह्माँ सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई। जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।।

दोहा 184

धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरिपद सुमिरु। जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति।।184।।

चौपाई 185

बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।। पुर बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।। जाके हृदयँ भगति जसि प्रीति। प्रभु तहँ प्रगट सदा तेहिं रीती।। तेहि समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।। हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं।। अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी।। मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।
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