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राम

1

बालकाण्ड

Bala Kanda

The childhood of Lord Ram: Tulsidas's invocations, the story of Shiva and Parvati, Ram's birth, education, and marriage to Sita.

770 verses

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Passage 18 of 39 · Verses 341–360 of 770

दोहा 156

नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु। चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु।।156।।

चौपाई 157

आवत देखि अधिक रव बाजी। चलेउ बराह मरुत गति भाजी।। तुरत कीन्ह नृप सर संधाना। महि मिलि गयउ बिलोकत बाना।। तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा।। प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा। रिस बस भूप चलेउ संग लागा।। गयउ दूरि घन गहन बराहू। जहँ नाहिन गज बाजि निबाहू।। अति अकेल बन बिपुल कलेसू। तदपि न मृग मग तजइ नरेसू।। कोल बिलोकि भूप बड़ धीरा। भागि पैठ गिरिगुहाँ गभीरा।। अगम देखि नृप अति पछिताई। फिरेउ महाबन परेउ भुलाई।।

दोहा 157

खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत। खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत।।157।।

चौपाई 158

फिरत बिपिन आश्रम एक देखा। तहँ बस नृपति कपट मुनिबेषा।। जासु देस नृप लीन्ह छड़ाई। समर सेन तजि गयउ पराई।। समय प्रतापभानु कर जानी। आपन अति असमय अनुमानी।। गयउ न गृह मन बहुत गलानी। मिला न राजहि नृप अभिमानी।। रिस उर मारि रंक जिमि राजा। बिपिन बसइ तापस कें साजा।। तासु समीप गवन नृप कीन्हा। यह प्रतापरबि तेहि तब चीन्हा।। राउ तृषित नहि सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना।। उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा।।

दोहा 158

भूपति तृषित बिलोकि तेहिं सरबरु दीन्ह देखाइ। मज्जन पान समेत हय कीन्ह नृपति हरषाइ।।158।।

चौपाई 159

गै श्रम सकल सुखी नृप भयऊ। निज आश्रम तापस लै गयऊ।। आसन दीन्ह अस्त रबि जानी। पुनि तापस बोलेउ मृदु बानी।। को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें। सुंदर जुबा जीव परहेलें।। चक्रबर्ति के लच्छन तोरें। देखत दया लागि अति मोरें।। नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा।। फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बडे भाग देखउँ पद आई।। हम कहँ दुर्लभ दरस तुम्हारा। जानत हौं कछु भल होनिहारा।। कह मुनि तात भयउ अँधियारा। जोजन सत्तरि नगरु तुम्हारा।।

सोरठा 159

निसा घोर गम्भीर बन पंथ न सुनहु सुजान। बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान।।159(क)।। तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ। आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ।।159(ख)।।

चौपाई 160

भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा।। नृप बहु भाँती प्रसंसेउ ताही। चरन बंदी निज भाग्य सराही।। पुनि बोले मृदु गिरा सुहाई। जानि पिता प्रभु करउँ ढिठाई।। मोहि मुनीस सुत सेवक जानी। नाथ नाम निज कहहु बखानी।। तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुह्रद सो कपट सयाना।। बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा।। समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती।। सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना।।

दोहा 160

कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत। नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेति।।160।।

चौपाई 161

कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना।। सदा रहहि अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ।। तेहि तें कहहि संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें।। तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा।। जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी।। सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी।। सब प्रकार राजहि अपनाई। बोलेउ अधिक सनेह जनाई।। सुनु सतिभाउ कहउँ महिपाला। इहाँ बसत बीते बहु काला।।

सोरठा 161

अब लगि मोहि न मिलेउ कोउ मैं न जनावउँ काहु। लोकमान्यता अनल सम कर तप कानन दाहु।।161(क)।। तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर। सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि।।161(ख)।।

चौपाई 162

तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं।। प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ।। तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें।। अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही।। जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा।। देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी।। नाम हमार एकतनु भाई। सुनि नृप बोले पुनि सिरु नाई।। कहहु नाम कर अरथ बखानी। मोहि सेवक अति आपन जानी।।

दोहा 162

आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि। नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि।।162।।

चौपाई 163

जनि आचरुज करहु मन माहीं। सुत तप तें दुर्लभ कछु नाहीं।। तपबल तें जग सृजइ बिधाता। तपबल बिष्नु भए परित्राता।। तपबल संभु करहिं संघारा। तप तें अगम न कछु संसारा।। भयउ नृपहि सुनि अति अनुरागा। कथा पुरातन कहै सो लागा।। करम धरम इतिहास अनेका। करइ निरूपन बिरति बिबेका।। उदभव पालन प्रलय कहानी। कहेसि अमित आचरज बखानी।। सुनि महिप तापस बस भयऊ। आपन नाम कहत तब लयऊ।। कह तापस नृप जानउँ तोही। कीन्हेहु कपट लाग भल मोही।।

दोहा 163

सुनु महीस असि नीति जहँ तहँ नाम न कहहिं नृप। मोहि तोहि पर अति प्रीति सोइ चतुरता बिचारि तव।।163।।

चौपाई 164

नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा। सत्यकेतु तव पिता नरेसा।। गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा।। देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई।। उपजि परि ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें।। अब प्रसन्न मैं संसय नाहीं। मागु जो भूप भाव मन माहीं।। सुनि सुबचन भूपति हरषाना। गहि पद बिनय कीन्हि बिधि नाना।। कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें।। प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी।।

दोहा 164

जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ।।164।।

चौपाई 165

कह तापस नृप ऐसेइ होऊ। कारन एक कठिन सुनु सोऊ।। कालउ तुअ पद नाइहि सीसा। एक बिप्रकुल छाड़ि महीसा।। तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा।। जौं बिप्रन्ह सब करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा।। चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई। सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई।। बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला। तोर नास नहि कवनेहुँ काला।। हरषेउ राउ बचन सुनि तासू। नाथ न होइ मोर अब नासू।। तव प्रसाद प्रभु कृपानिधाना। मो कहुँ सर्ब काल कल्याना।।

दोहा 165

एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि। मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि।।165।।

चौपाई 166

तातें मै तोहि बरजउँ राजा। कहें कथा तव परम अकाजा।। छठें श्रवन यह परत कहानी। नास तुम्हार सत्य मम बानी।। यह प्रगटें अथवा द्विजश्रापा। नास तोर सुनु भानुप्रतापा।। आन उपायँ निधन तव नाहीं। जौं हरि हर कोपहिं मन माहीं।। सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा।। राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता।। जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें।। एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा।।
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