राम मातु गुर पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।।
नंदिगावँ करि परन कुटीरा। कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा।।
जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस साँथरी सँवारी।।
असन बसन बासन ब्रत नेमा। करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तिन तूरी।।
अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई।।
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।।
रमा बिलासु राम अनुरागी। तजत बमन जिमि जन बड़भागी।।2
अयोध्याकाण्ड
Ayodhya Kanda
Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.
664 verses
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Passage 34 of 34 · Verses 661–664 of 664
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति।
चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति।।324।।Transliteration
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Commentary & notes
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई। घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई।।
नित नव राम प्रेम पनु पीना। बढ़त धरम दलु मनु न मलीना।।
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बनज बिकासे।।
सम दम संजम नियम उपासा। नखत भरत हिय बिमल अकासा।।
ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी।।
राम पेम बिधु अचल अदोषा। सहित समाज सोह नित चोखा।।
भरत रहनि समुझनि करतूती। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती।।
बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।Transliteration
Metered English
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What it means
Commentary & notes
नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति।।
मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति।।325।।