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राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

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Passage 32 of 34 · Verses 621–640 of 664

चौपाई 304

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ। लघु मति चापलता कबि छमहूँ।। कहत सुनत सति भाउ भरत को। सीय राम पद होइ न रत को।। सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को।। देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।। धरम धुरीन धीर नय नागर। सत्य सनेह सील सुख सागर।। देसु काल लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।। बोले बचन बानि सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रसु से।। तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।

दोहा 304

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात।।304।।

चौपाई 305

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।। समउ समाजु लाज गुरुजन की। उदासीन हित अनहित मन की।। तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपन मोर परम हित धरमू।। मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउँ अवसर अनुसारा।। तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी।। नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहि सहित सबु होत खुआरू।। जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू। जग केहि कहहु न होइ कलेसू।। तस उतपातु तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा।।

दोहा 305

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम।।305।।

चौपाई 306

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।। मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।। सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनिकुल पालक होहू।। साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।। सो बिचारि सहि संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।। बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई।। जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा। कुसमयँ तात न अनुचित मोरा।। होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए।।

दोहा 306

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।।306।।

चौपाई 307

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी।। सिथिल समाज सनेह समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।। भरतहि भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।। मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू।। कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानि पंकरुह जोरी।। नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउँ लाहु जग जनमु भए को।। अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।। सो अवलंब देव मोहि देई। अवधि पारु पावौं जेहि सेई।।

दोहा 307

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ।।307।।

चौपाई 308

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयँ सकोच जात कहि नाहीं।। कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई।। चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।। प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होइ त आवौं देखी।। अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।। मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।। रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।। सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।

दोहा 308

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल।।308।।

चौपाई 309

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हरषत बरिआई। मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।। भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।। सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।। मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।। सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू।। राम मातु दुखु सुखु सम जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।। एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत भरत भलाई।।

दोहा 309

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप।।309।।

चौपाई 310

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहँ कूप अगाधू।। पावन पाथ पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेउ काल बिदित नहिं केहू।। तब सेवकन्ह सरस थलु देखा। किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू। सुगम अगम अति धरम बिचारू।। भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीरथ जल जोगा।। प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी। होइहहिं बिमल करम मन बानी।।

दोहा 310

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ। अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ।।310।।

चौपाई 311

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोरु निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहि भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।। सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटन पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।। कुस कंटक काँकरीं कुराईं। कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं।। महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे। बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।। सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी। सेवहिं सकल राम प्रिय जानी।।

दोहा 311

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात। राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात।।311।।

चौपाई 312

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा।। चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतु दिब्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।। कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा। कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा।। कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।। देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा।। फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।

दोहा 312

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ।।312।।

चौपाई 313

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू। भरत भूमिसुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचाहीं।। गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराहि सभा सब सोची। कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची।। भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।। मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भाँति दुखु पावा आपू।। अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।

दोहा 313

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल।।313।।
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