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राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

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Passage 29 of 34 · Verses 561–580 of 664

चौपाई 275

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।। गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं।। राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।। मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।। आवत जनकु चले एहि भाँती। सहित समाज प्रेम मति माती।। आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परसपर लागे।। लगे जनक मुनिजन पद बंदन। रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन।। भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि। चले लवाइ समेत समाजहि।।

दोहा 275

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु।।275।।

चौपाई 276

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससोक मिलत नद नारे।। सोच उसास समीर तंरगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।। बिषम बिषाद तोरावति धारा। भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा।। बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियँ हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई।। सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा।। भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।

छन्द 11

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।। सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की। तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की।।

दोहा 276

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।276।।

चौपाई 277

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।। तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम सनेह बड़ाई।। बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।। राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभाँ बड़ आदर तासू।। सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनधार बिनु जिमि जलजानू।। मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।। सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासरु बीतेउ बिनु बारी।। पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।

दोहा 277

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात।।277।।

चौपाई 278

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिलापति नगर निवासी।। हंस बंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा।। लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धरम नय बिरति बिबेका।। कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं। समुझाई सब सभा सुबानीं।। तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ।। मुनि कह उचित कहत रघुराई। गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई।। रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। इहाँ उचित नहिं असन अनाजू।। कहा भूप भल सबहि सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।

दोहा 278

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार।।278।।

चौपाई 279

कामद मे गिरि राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।। सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनँद अनुरागा।। बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।। तेहि अवसर बन अधिक उछाहू। त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।। जाइ न बरनि मनोहरताई। जनु महि करति जनक पहुनाई।। तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।। देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे।। दल फल मूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।

दोहा 279

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार।।279।।

चौपाई 280

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।। दुहु समाज असि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं।। सीता राम संग बनबासू। कोटि अमरपुर सरिस सुपासू।। परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही।। दाहिन दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसिअ बन तबही।। मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला। राम दरसु मुद मंगल माला।। अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।। सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होहिं न जनिअहिं जाता।।

दोहा 280

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु।। सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु।।280।।

चौपाई 281

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं।। सीय मातु तेहि समय पठाईं। दासीं देखि सुअवसरु आईं।। सावकास सुनि सब सिय सासू। आयउ जनकराज रनिवासू।। कौसल्याँ सादर सनमानी। आसन दिए समय सम आनी।। सीलु सनेह सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा।। पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन। महि नख लिखन लगीं सब सोचन।। सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती। जनु करुना बहु बेष बिसूरति।। सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी। जो पय फेनु फोर पबि टाँकी।।

दोहा 281

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।281।।

चौपाई 282

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।। जो सृजि पालइ हरइ बहोरी। बाल केलि सम बिधि मति भोरी।। कौसल्या कह दोसु न काहू। करम बिबस दुख सुख छति लाहू।। कठिन करम गति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।। ईस रजाइ सीस सबही कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।। देबि मोह बस सोचिअ बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।। भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिअ सखि लखि निज हित हानी।। सीय मातु कह सत्य सुबानी। सुकृती अवधि अवधपति रानी।।

दोहा 282

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।282।।

चौपाई 283

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सुतबधू देवसरि बारी।। राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहउँ सखी सति भाऊ।। भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।। कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।। जानउँ सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।। कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ। पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ। अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेहँ सयानप थोरा।। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानी।।

दोहा 283

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि। को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि।।283।।

चौपाई 284

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भाँति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन। जौं यह मत मानै महीप मन।। तौ भल जतनु करब सुबिचारी। मोरें सौचु भरत कर भारी।। गूढ़ सनेह भरत मन माही। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।। लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी। सब भइ मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि।। सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनी उठी सप्रीती।।
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