Skip to main content
राम

2

अयोध्याकाण्ड

Ayodhya Kanda

Ram's exile from Ayodhya: Dasharatha's court, Kaikeyi's demands, Ram's departure, Bharat's devotion.

664 verses

Explore illustrated passages (34)

Choose sections

Show or hide supporting sections

Passage 22 of 34 · Verses 421–440 of 664

चौपाई 206

प्रमुदित तीरथराज निवासी। बैखानस बटु गृही उदासी।। कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा। भरत सनेह सीलु सुचि साँचा।। सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनिबर पहिं आए।। दंड प्रनामु करत मुनि देखे। मूरतिमंत भाग्य निज लेखे।। धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे। दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे।। आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे। चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे।। मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू। बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू।। सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।

दोहा 206

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति। तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।206।।

चौपाई 207

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ। लोकु बेद बुध संमत दोऊ।। तात तुम्हार बिमल जसु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।। लोक बेद संमत सबु कहई। जेहि पितु देइ राजु सो लहई।। राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई। देत राजु सुखु धरमु बड़ाई।। राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला।। सो भावी बस रानि अयानी। करि कुचालि अंतहुँ पछितानी।। तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू। कहै सो अधम अयान असाधू।। करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू। रामहि होत सुनत संतोषू।।

दोहा 207

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।207।।

चौपाई 208

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना। भूरिभाग को तुम्हहि समाना।। यह तम्हार आचरजु न ताता। दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।। सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं।। लखन राम सीतहि अति प्रीती। निसि सब तुम्हहि सराहत बीती।। जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा।। तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।। यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रनत कुटुंब पाल रघुराई।। तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।

दोहा 208

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।208।।

चौपाई 209

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।। उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना। घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना।। कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही।। निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू।। पूरन राम सुपेम पियूषा। गुर अवमान दोष नहिं दूषा।। राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ। कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ।। भूप भगीरथ सुरसरि आनी। सुमिरत सकल सुंमगल खानी।। दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं। अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं।।

दोहा 209

जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ।। जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ।।209।।

चौपाई 210

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा। जहँ बस राम पेम मृगरूपा।। तात गलानि करहु जियँ जाएँ। डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ।।।। सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं। उदासीन तापस बन रहहीं।। सब साधन कर सुफल सुहावा। लखन राम सिय दरसनु पावा।। तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा। सहित पयाग सुभाग हमारा।। भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ। कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ।। सुनि मुनि बचन सभासद हरषे। साधु सराहि सुमन सुर बरषे।। धन्य धन्य धुनि गगन पयागा। सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा।।

दोहा 210

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन। करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन।।210।।

चौपाई 211

मुनि समाजु अरु तीरथराजू। साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू।। एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई। एहि सम अधिक न अघ अधमाई।। तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ। उर अंतरजामी रघुराऊ।। मोहि न मातु करतब कर सोचू। नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू।। नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू। पितहु मरन कर मोहि न सोकू।। सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए। लछिमन राम सरिस सुत पाए।। राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू। भूप सोच कर कवन प्रसंगू।। राम लखन सिय बिनु पग पनहीं। करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही।।

दोहा 211

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात। बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात।।211।।

चौपाई 212

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती। भूख न बासर नीद न राती।। एहि कुरोग कर औषधु नाहीं। सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं।। मातु कुमत बढ़ई अघ मूला। तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला।। कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू। गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु।। मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा। घालेसि सब जगु बारहबाटा।। मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ। बसइ अवध नहिं आन उपाएँ।। भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई। सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई।। तात करहु जनि सोचु बिसेषी। सब दुखु मिटहि राम पग देखी।।

दोहा 212

करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु। कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु।।212।।

चौपाई 213

सुनि मुनि बचन भरत हिंय सोचू। भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू।। जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी। चरन बंदि बोले कर जोरी।। सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरम यहु नाथ हमारा।। भरत बचन मुनिबर मन भाए। सुचि सेवक सिष निकट बोलाए।। चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई। कंद मूल फल आनहु जाई।। भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए। प्रमुदित निज निज काज सिधाए।। मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता। तसि पूजा चाहिअ जस देवता।। सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई। आयसु होइ सो करहिं गोसाई।।

दोहा 213

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज। पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज।।213।।

चौपाई 214

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी। बड़भागिनि आपुहि अनुमानी।। कहहिं परसपर सिधि समुदाई। अतुलित अतिथि राम लघु भाई।। मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू। होइ सुखी सब राज समाजू।। अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना। जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना।। भोग बिभूति भूरि भरि राखे। देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे।। दासीं दास साजु सब लीन्हें। जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें।। सब समाजु सजि सिधि पल माहीं। जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं।। प्रथमहिं बास दिए सब केही। सुंदर सुखद जथा रुचि जेही।।

दोहा 214

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह। बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह।।214।।

चौपाई 215

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका। सब लघु लगे लोकपति लोका।। सुख समाजु नहिं जाइ बखानी। देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी।। आसन सयन सुबसन बिताना। बन बाटिका बिहग मृग नाना।। सुरभि फूल फल अमिअ समाना। बिमल जलासय बिबिध बिधाना। असन पान सुच अमिअ अमी से। देखि लोग सकुचात जमी से।। सुर सुरभी सुरतरु सबही कें। लखि अभिलाषु सुरेस सची कें।। रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी। सब कहँ सुलभ पदारथ चारी।। स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा। देखि हरष बिसमय बस लोगा।।

दोहा 215

संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार।। तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार।।215।।
Continue reading →