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राम

3

अरण्यकाण्ड

Aranya Kanda

Life in the forest: encounters with sages, Surpanakha, the golden deer, Sita's abduction by Ravana.

98 verses

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Passage 2 of 5 · Verses 21–40 of 98

दोहा 9

निसिचर हीन करउँ महि भुज उठाइ पन कीन्ह। सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।9।।

चौपाई 9

मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सुतीछन रति भगवाना।। मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुँ आन भरोस न देवक।। प्रभु आगवनु श्रवन सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।। हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मो से सठ पर करिहहिं दाया।। सहित अनुज मोहि राम गोसाई। मिलिहहिं निज सेवक की नाई।। मोरे जियँ भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।। नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।। एक बानि करुनानिधान की। सो प्रिय जाकें गति न आन की।। होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।। निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानी। कहि न जाइ सो दसा भवानी।। दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउँ कहाँ नहिं बूझा।। कबहुँक फिरि पाछें पुनि जाई। कबहुँक नृत्य करइ गुन गाई।। अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखैं तरु ओट लुकाई।। अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटे हृदयँ हरन भव भीरा।। मुनि मग माझ अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।। तब रघुनाथ निकट चलि आए। देखि दसा निज जन मन भाए।। मुनिहि राम बहु भाँति जगावा। जाग न ध्यानजनित सुख पावा।। भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयँ चतुर्भुज रूप देखावा।। मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनि बर जैसें।। आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुख धामा।। परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बड़भागी।। भुज बिसाल गहि लिए उठाई। परम प्रीति राखे उर लाई।। मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।। राम बदनु बिलोक मुनि ठाढ़ा। मानहुँ चित्र माझ लिखि काढ़ा।।

दोहा 10

तब मुनि हृदयँ धीर धीर गहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आनि करि पूजा बिबिध प्रकार।।10।।

चौपाई 10

कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति करौं कवन बिधि तोरी।। महिमा अमित मोरि मति थोरी। रबि सन्मुख खद्योत अँजोरी।। श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनिचीरं।। पाणि चाप शर कटि तूणीरं। नौमि निरंतर श्रीरघुवीरं।। मोह विपिन घन दहन कृशानुः। संत सरोरुह कानन भानुः।। निशिचर करि वरूथ मृगराजः। त्रातु सदा नो भव खग बाजः।। अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।। हर ह्रदि मानस बाल मरालं। नौमि राम उर बाहु विशालं।। संशय सर्प ग्रसन उरगादः। शमन सुकर्कश तर्क विषादः।। भव भंजन रंजन सुर यूथः। त्रातु सदा नो कृपा वरूथः।। निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।। अमलमखिलमनवद्यमपारं। नौमि राम भंजन महि भारं।। भक्त कल्पपादप आरामः। तर्जन क्रोध लोभ मद कामः।। अति नागर भव सागर सेतुः। त्रातु सदा दिनकर कुल केतुः।। अतुलित भुज प्रताप बल धामः। कलि मल विपुल विभंजन नामः।। धर्म वर्म नर्मद गुण ग्रामः। संतत शं तनोतु मम रामः।। जदपि बिरज ब्यापक अबिनासी। सब के हृदयँ निरंतर बासी।। तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मनसि मम काननचारी।। जे जानहिं ते जानहुँ स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।। जो कोसल पति राजिव नयना। करउ सो राम हृदय मम अयना। अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।। सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।। परम प्रसन्न जानु मुनि मोही। जो बर मागहु देउ सो तोही।। मुनि कह मै बर कबहुँ न जाचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।। तुम्हहि नीक लागै रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।। अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ग्यान निधाना।। प्रभु जो दीन्ह सो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।

दोहा 11

अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मम हिय गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।11।।

चौपाई 11

एवमस्तु करि रमानिवासा। हरषि चले कुभंज रिषि पासा।। बहुत दिवस गुर दरसन पाएँ। भए मोहि एहिं आश्रम आएँ।। अब प्रभु संग जाउँ गुर पाहीं। तुम्ह कहँ नाथ निहोरा नाहीं।। देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग बिहसै द्वौ भाई।। पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुँचे सुरभूपा।। तुरत सुतीछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।। नाथ कौसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।। राम अनुज समेत बैदेही। निसि दिनु देव जपत हहु जेही।। सुनत अगस्ति तुरत उठि धाए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।। मुनि पद कमल परे द्वौ भाई। रिषि अति प्रीति लिए उर लाई।। सादर कुसल पूछि मुनि ग्यानी। आसन बर बैठारे आनी।। पुनि करि बहु प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।। जहँ लगि रहे अपर मुनि बृंदा। हरषे सब बिलोकि सुखकंदा।।

दोहा 12

मुनि समूह महँ बैठे सन्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चितवत मानहुँ निकर चकोर।।12।।

चौपाई 12

तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाही।। तुम्ह जानहु जेहि कारन आयउँ। ताते तात न कहि समुझायउँ।। अब सो मंत्र देहु प्रभु मोही। जेहि प्रकार मारौं मुनिद्रोही।। मुनि मुसकाने सुनि प्रभु बानी। पूछेहु नाथ मोहि का जानी।। तुम्हरेइँ भजन प्रभाव अघारी। जानउँ महिमा कछुक तुम्हारी।। ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।। जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहि न जानहिं आना।। ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयँ डरत सदा सोउ काला।। ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूँछेहु मोहि मनुज की नाईं।। यह बर मागउँ कृपानिकेता। बसहु हृदयँ श्री अनुज समेता।। अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।। जद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहि संता।। अस तव रूप बखानउँ जानउँ। फिरि फिरि सगुन ब्रह्म रति मानउँ।। संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूँछेहु रघुराई।। है प्रभु परम मनोहर ठाऊँ। पावन पंचबटी तेहि नाऊँ।। दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र साप मुनिबर कर हरहू।। बास करहु तहँ रघुकुल राया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।। चले राम मुनि आयसु पाई। तुरतहिं पंचबटी निअराई।।

दोहा 13

गीधराज सैं भैंट भइ बहु बिधि प्रीति बढ़ाइ।। गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह छाइ।।13।।

चौपाई 13

जब ते राम कीन्ह तहँ बासा। सुखी भए मुनि बीती त्रासा।। गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति हौहिं सुहाए।। खग मृग बृंद अनंदित रहहीं। मधुप मधुर गंजत छबि लहहीं।। सो बन बरनि न सक अहिराजा। जहाँ प्रगट रघुबीर बिराजा।। एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।। सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछउँ निज प्रभु की नाई।। मोहि समुझाइ कहहु सोइ देवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।। कहहु ग्यान बिराग अरु माया। कहहु सो भगति करहु जेहिं दाया।।

दोहा 14

ईस्वर जीव भेद प्रभु सकल कहौ समुझाइ।। जातें होइ चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।14।।

चौपाई 14

थोरेहि महँ सब कहउँ बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।। मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।। गो गोचर जहँ लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। बिद्या अपर अबिद्या दोऊ।। एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।। एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।। ग्यान मान जहँ एकउ नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माही।। कहिअ तात सो परम बिरागी। तृन सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।

दोहा 15

माया ईस न आपु कहुँ जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्बपर माया प्रेरक सीव।।15।।

चौपाई 15

धर्म तें बिरति जोग तें ग्याना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।। जातें बेगि द्रवउँ मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।। सो सुतंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।। भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलइ जो संत होइँ अनुकूला।। भगति कि साधन कहउँ बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।। प्रथमहिं बिप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।। एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।। श्रवनादिक नव भक्ति दृढ़ाहीं। मम लीला रति अति मन माहीं।। संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।। गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहँ जाने दृढ़ सेवा।। मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।। काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।

दोहा 16

बचन कर्म मन मोरि गति भजनु करहिं निःकाम।। तिन्ह के हृदय कमल महुँ करउँ सदा बिश्राम।।16।।

चौपाई 16

भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।। एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीती।। सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जस अहिनी।। पंचबटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भइ जुगल कुमारा।। भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।। होइ बिकल सक मनहि न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहि बिलोकी।। रुचिर रुप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसुकाई।। तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह सँजोग बिधि रचा बिचारी।। मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउँ खोजि लोक तिहु नाहीं।। ताते अब लगि रहिउँ कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहि निहारी।। सीतहि चितइ कही प्रभु बाता। अहइ कुआर मोर लघु भ्राता।। गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।। सुंदरि सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहिं तोर सुपासा।। प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहि सब छाजा।। सेवक सुख चह मान भिखारी। ब्यसनी धन सुभ गति बिभिचारी।। लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।। पुनि फिरि राम निकट सो आई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।। लछिमन कहा तोहि सो बरई। जो तृन तोरि लाज परिहरई।। तब खिसिआनि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।। सीतहि सभय देखि रघुराई। कहा अनुज सन सयन बुझाई।।

दोहा 17

लछिमन अति लाघवँ सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताके कर रावन कहँ मनौ चुनौती दीन्हि।।17।।

चौपाई 17

नाक कान बिनु भइ बिकरारा। जनु स्त्रव सैल गैरु कै धारा।। खर दूषन पहिं गइ बिलपाता। धिग धिग तव पौरुष बल भ्राता।। तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जातुधान सुनि सेन बनाई।। धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।। नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।। सुपनखा आगें करि लीनी। असुभ रूप श्रुति नासा हीनी।। असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।। गर्जहि तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कटकु भट अति हरषाहीं।। कोउ कह जिअत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय लेहु छड़ाई।। धूरि पूरि नभ मंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।। लै जानकिहि जाहु गिरि कंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।। रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।। देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चढ़ावा।।

छन्द 3

कोदंड कठिन चढ़ाइ सिर जट जूट बाँधत सोह क्यों। मरकत सयल पर लरत दामिनि कोटि सों जुग भुजग ज्यों।। कटि कसि निषंग बिसाल भुज गहि चाप बिसिख सुधारि कै।। चितवत मनहुँ मृगराज प्रभु गजराज घटा निहारि कै।।

दोहा 18

आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जथा बिलोकि अकेल बाल रबिहि घेरत दनुज।।18।।
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