Original recitation texts for supplementary passages
The eighty root verses appear in Devanagari beside their English translations throughout the main text. This appendix supplies the original wording of every additional verse, doha, kavitta, song, Sanskrit citation, and concluding recitation passage translated above.
Preface quotation
यही पद गाय ध्यान मंजरी संगाय, कही माथै पधराय सियाराम हितकारी है । याको देस काल पढ़ते ही हिये भाखै तोहि, आसीसा को फल थोरे काल ही में पाई है ॥
The commentator's invocation
श्री सम्प्रदाय सुदीप श्री रामानन्दहि ध्याय । अग्र कीन्ह पद परसि निज गुरु चरणन सिर नाय ॥ आसीसवादी राम सिय ध्यान मंजरी मंजु । तासु तिलक हनुमत कृपा लिखौं ललित सुखपुंज ॥
Sita and Rama: speech and meaning
गिरा अरथ जल बीचि सम कहियत भिन्न न भिन्न । बन्दौं सीताराम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥
Scriptural praise of Ayodhya
यद्यपि सब बैकुंठ बखाना । वेद पुरान विदित जग जाना ॥ अवध सरिस प्रिय मोहि न सोऊ । यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥
The picture halls
चारु चित्रसाला गृह, गृह प्रति लिखे बनाय । रामचरित जे निरख मुनि, ते मन लेहि चोराय ॥
The jewel-lit houses
बहु मणि रचित झरोखा भ्राजै । गृह गृह प्रति मणि दीप विराजै ॥
Gitavali excerpt on Avadh
देखत अवध को आनन्द । हरषि वरषत सुमन दिन दिन देवतन के वृन्द ॥ मध्य दिवस विलम्बि चलत दिनेस उडुगन चन्द ॥
The city that grants Rama's abode
रामधामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त विदित जग पावनि ॥ चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजे तन नहि संसारा ॥ सब विधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥
Vedic testimony concerning Ayodhya
अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या । तस्यां हिरण्मयः कोशः स्वर्गो लोको ज्योतिषावृतः ॥
यो वै तां ब्रह्मणो वेद अमृतेनावृतां पुरीम् । तस्मै ब्रह्म च ब्रह्मा च आयुः कीर्तिं प्रजां ददुः ॥
Smriti testimony concerning Ayodhya
अयोध्या च परं ब्रह्म सरयू सगुणः पुमान् । तन्निवासी जगन्नाथः सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥
विष्णोः पादमवन्तिकां गुणवतीं मध्ये च काञ्चीपुरीम् । नाभौ द्वारवतीं तथा च हृदये मायापुरीं पुण्यदाम् ॥ ग्रीवामूलमुदाहरन्ति मथुरां नासाग्रवाराणसीम् । एतद् ब्रह्मपदं वदन्ति मुनयोऽयोध्यापुरीं मस्तकम् ॥
Kavitta on the sacred cities
पुरुष के पायन अवंती गुणवंती लसै, पुरी कांची कटि द्वारावती नाभि भ्राजती । माया हृदय माहि कंठ मथुरा कहाहि कासी, नासा अग्र पाहि छौ छहूँ अंग छाजती ॥ एई ब्रह्मपद कहे मुनि रसरंग भनी, सबन के सीस पर अवधि विराजती । अवधि के सीस पर मुकुटाभरण सम, सरित सिरोमणि सरजू शोभा पावती ॥
Kavitta: Avadh is the culmination of all cities
जोग की अवधि दिव्य भोग की अवधि, न वियोग याके मध्य भवरोग औषधि है । ज्ञान की अवधि प्रभु ध्यान की अवधि, दुखहान की अवधि देनि सुख को उदधि है ॥ जस को अवधि भक्तिरस की अवधि, रामवस की अवधि प्रेमघृत हेतु दधि है । रामरूपा जानि बसि सेवै रसरंगमणि, अवधि तो सब ही पुरीन की अवधि है ॥
Names of Ayodhya
जयति अयोध्या कोसला, जय विमला साकेत । जयति अवध अपराजिता, सत्या सरजू समेत ॥
Self-comparison of the incomparable
लही न कतहुँ हारि हिय मानी । इन सम इहइ उपमा उर आनी ॥
Song from Sri Avadha Bindu
श्री अवधपुरी की यह छबि पर मैं वारी । ब्रह्मभवन बैकुंठहु का है, का कैलास विकारी । त्रिगुण तीन देवन की ते हैं, या तो उनते न्यारी ॥
The Lord's statement on bathing in the Sarayu
जा मज्जन ते बिनहि प्रयासा । मम समीप नर पावहिं बासा ॥
Kavitta on the generosity of the Sarayu
जग के तमाम नर वाम रामधाम जात, नाम गुण ग्राम सुचि सरजू के सुनि सुनि । जम की जमात जम द्वारे बिललात गहे, पावत न पापी पछितात सीस धुनि धुनि ॥ अंग अंग फूल रसरंगमणि कूल बसि, रामगंग महिमा महान अस गुनि गुनि । तारिवे को तरल तरंग हाथ से उठाय, मानहुँ पुकारती है पातकिन पुनि पुनि ॥
Gitavali passage on bees among lotuses
विकसित कमलावली चले पुंज चंचरीक, गुंजत कल कोमल धुनि त्यागि कंज न्यारे । जनु विराग पाइ सकल शोक कूप गृह विहाय, भृत्य प्रेममत्त फिरत गुनत गुण तिहारे ॥
Chappaya on Sri Ashoka Grove
विपिन अशोक जहाँ व्यापत न शोक, सिय अलिन के थोक रास ओक बहु शोभाकर । क्रीड़ाचल सरित सरोवर विहंग वर वाटिका, सुघर सुरतरु पाँति लताधर ॥ नाग नर देव नृप गंधर्वसुता अनेक, कोटिन के वृन्द मध्य राजै नित सियावर । सरजू के तीर बहै सीतल समीर, तहाँ बैठि वर नौर तिरखा पुलिनादि घर ॥
Savaiya on Sri Rama's eyes
बाँके बड़े उमड़े सुखमा, उपमा मृग खंजन मीन लहै ना । छाल सितासित रंग भरे, रसरंगमणि मनमोहन पैना ॥ सुन्दर शारद सारस के सम, शील रसील सुशील के ऐना । नैनन मेरे बसें नित, जान जियावन जानकिनाथ के नैना ॥
Sanskrit verse on the flowering forest
भ्रमरालिकुलैर्युक्ते पुष्पगन्धानुमोदिते । शुकशारिकामयूरैश्च कोकिलैरभिकूजिते ॥
Kavitta on Sri Rama's hands and rings
शर धनु धरन, दरन दुख दीनन के, भरन करन विश्वभर के उदर के । सुरसा सुवन से हैं दादुर दुवन के, विभूषण भुवन के वरद हरिहर के ॥ मंडित हैं रसराम अँगुलिन अभिराम, रामनाम अंकित त्यों मुद्रिका सुघर के । मणि से नखर के, वर्ण दिनकर के, सुकंज शोभा सर के हैं कर सियवर के ॥
Kavittas on the forty-eight marks of the feet
ध्यावै रसराम रामपद चिह्न दाहिने में, ऊर्ध्व सुरेखा मन स्वस्तिक सुजानि कै । अष्टकोण रमा हल मूसल सर्प पर, अंबर जलज रथ वस्त्र जव जानि कै ॥ कल्पवृक्ष अंकुश ध्वजा मुकुट चक्रराज, आसन सु यमदंड यमभीति भानि कै । चामर सुछत्र नर जौ माला एई अंक, सीय पद वाम में विलोकत बखानि कै ॥१॥
राम वाम पद चिह्न ध्यावै रसराममणि, सरजू सुगोपद सुभूमि उर आनि कै । कलश पताका जम्बूफल अर्धचन्द्र शंख, षट्कोण त्रिकोण गदा जीव जानि कै ॥ बिन्दु शक्ति सुधाकुण्ड त्रिवली त्यों मीन मंजु, पूरो चन्द्र वीणा वंशी धनु सुख सानि कै । तूण हंस चन्द्रिकादि एई अंक सीय पद, दाहिने में देखत महान मोद मानि कै ॥२॥
Katha Upanishad
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं, नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्वं, तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥
Testimony concerning Rama as being-consciousness-bliss
रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि । इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
अर्धमात्रात्मको रामो ब्रह्मानन्दैकविग्रहः ॥
चिदानन्दमय देह तुम्हारी । विगत विकार जान अधिकारी ॥
Testimony concerning Sita and the Divine Couple
हेममया द्विभुजया सर्वालंकृतया चिता ॥
स इममेवात्मानं द्वेधापातयत् । ततः पतिश्च पत्नी चाभवताम् ॥
Doha from Sri Sneha Prakashika
सिय तोरे गोरे गरे, पोति जोति छवि छाय । मनहुँ रंगीले लाल की, भुजा रही लपटाय ॥
Kavitta on Sri Sita's feet
जोहिये न जावक जपा बन्धूक विद्रुम में, रजोगुण नवल रसाल द्रुम दल में । छेक सुमन में न वीरवधू तन में, न वन्दन कुसुम्भ हूँ गुलाब गिरा जल में ॥ बिम्ब ही के फल में न बाल दिवाकर में, न रति के अधर में न मंजुल कमल में । ऐसी कोमलताई औ ललाई न सुहाई कहूँ, जैसी रसरंगमणि सीय पदतल में ॥
Song comparing Sita and Rama only with themselves
राम से राम, सीता सो सीता । शिव विरंचि शारदा शेष शुक, पटतर खोजा कम श्रम बीता ॥ सुन्दर शील सुहाग अमित गुण, अखिल लोक नर नारी जीता । अग्रस्वामि स्वामिनी उजागर, नेति नेति श्रुति गावत गीता ॥
Glory of Raghunatha's deeds
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥
Vinaya Patrika passage concerning Hanuman
महानाटक निपुण कोटि कविकुल तिलक, गान गुण गर्व गन्धर्व जेता । जयति सिंहासनासीन सीतारमण निरखि, निर्भर हर्ष नृत्यकारी ॥
Doha on devotion beyond dry liberation
रामचन्द्र के भजन बिनु, जो चह पद निर्वान । ज्ञानवन्त अपि सो नर, पशु बिन पूँछ विषान ॥
Sanskrit verse on the soul's eternal service
दासभूताः स्वतः सर्वे ह्यात्मानः परमात्मनः । नान्यथा लक्षणं येषां बन्धे मुक्तिः सदा हि ते ॥
The commentator's concluding doha
बन्दौं श्री सरयू अवध, सिय रघुवर हनुमन्त । भरत लखन रिपुरमन पद, श्रीगुरु धनु शर सन्त ॥ कृत मकरन्द सुमाधुरी, टीका मणि रसराम । कहहिं सुनहिं तिन हित करै, जय श्री सीताराम ॥
The commentator's Barvai verses
शत उनीस पुनि पचपन संवत माहि । माधव सित भृगु जानकी नवमी काहि ॥१॥ सीताराम शरण जन मणि रसराम । टीका रचि तट सरयू अवध सुधाम ॥२॥ अग्रस्वामि पद बन्दे सांगै यहु । हिये ध्यान सिय रघुवर नाम सनेहु ॥३॥
The commentator's concluding Kavitta
जुगल किशोर गौर श्यामल सनेह सने, ललित सुबाहु कल कंठन कसे रहैं । केलि के उछाह छवि छाके दोउ दोहूँन के, लूटत आनंद लीला लोभित लसे रहैं ॥ फेरत विलोचन विलोल त्यों विनोद माते, राते रस रंग तन हेरत हेते रहैं । सिया रघुनन्दन आनंदकन्द युगचन्द, ऐसेहि हमारे हिय वियत उगे रहैं ॥
Appendix Kavitta on the bow
राजै रघुनाथ वामहाथ रसरंग मनो, दिव्य कामचाप ते सुचारु चित्रकारी को । सुनै जासु रौंदा को कठोर घोर सोर काँपै, अरि जैसे करि सुनि नाद कुंजरारी को ॥ संत सुरपाल वक्र बालक मयंक गति, लंकपति काल अभयदायक दुखारी को । धरनी धरम धेनु द्विज रखवार भारी, बन्दौं आयुधाधिप धनुष धनुधारी को ॥
Appendix Kavitta on the arrow
महावायु बसत हमेस जुग पंखन पै, छूटत में छोभैं सातों सिन्धु त्यों जहान हैं । फर पै विराजै भानु पावक महान दोऊ, गुरुता गजब मेरु मन्दर समान है ॥ सूक्ष्म आकाश ज्यों प्रकाशै रसरंगमणि, एक ते अमोघ होत रूप बेप्रमान है । कुलिश ते कोटि गुने शूल ते सहस्र गुने, चक्र ते चालीस गुने चले रामबान हैं ॥
Complete Gitavali song on Avadh
देखत अवध को आनंद । हरषि वरषत सुमन निशि दिन देवतनि को वृन्द ॥ नगर रचना सिखन को विधि तकत बहु विधिबन्द । निपट लागत अगम ज्यों जलचरहि गमन सुछन्द ॥ मुदित पुरलोगनि सराहत निरखि सुखमाकन्द । जिनके सुअलि चख पियत राममुखारविन्द मरन्द ॥ मध्य व्योम विलम्बि चलत दिनेश उडुगन चन्द । रामपुरी बिलोकि तुलसी मिटत सब दुखद्वन्द ॥
Concluding verses of Tulsidas
एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास । एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास ॥
एक भरोसो रामबल, रामनाम विश्वास । सुमिरि नाम मंगल कुसल, माँगत तुलसीदास ॥
तबलगि कुसल न जीव कहुँ, सपनेहुँ मन विश्राम । जबलगि भजत न रामपद, सोकधाम तजि काम ॥
रसना साँपिनि बदन बिल, जो न जपहिं हरिनाम । तुलसी प्रेम न राम सो, ताहि विधाता बाम ॥
हिय फाटहु फूटहु नयन, जरहु ते तन केहि काम । द्रवहिं स्रवहिं पुलकहिं नहीं, तुलसी सुमिरत राम ॥